उत्तराखंड प्रकरण, एक मामले में, छोटे स्तर पर ऐतिहसिक है! वैसे आजकल फैशन चल पड़ा है, किसी भी घटना को ऐतिहसिक घोषित करने का, जैसे आई पी एल में रन बनाने का, मोदी का विदेश जाने का, आदि!
उत्तराखंड में केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति शाशन लगाया! दलील है विधान सभा के सदस्यों की खरीद फरक्त! यह कहीं से भी नया नहीं है, भारतीय प्रजातंत्र के इतिहास में! राज्यपाल ने केंद्र के ‘आदेश’ पर कार्यवाही की, यह भी कतई ऐतिहसिक नहीं था!
कोंग्रेस से टूटे विधायक अयोग्य घोषित किये गए विधान सभा के स्पीकर द्वारा, आरोप था दल बदल! सबकुछ पुराना ही चल रहा था! राज्यपाल ने पहले मुख्य मंत्री को बहुमत साबित करने को कहा, पर समय से पहले, केंद्र की चाटुकारिता करते हुए राष्ट्रपति शाशन के लिए ‘आवेदन’ दिया, जिसे केन्द्रीय सरकार ने स्वीकार और रातों रात राष्ट्रपति के पास भेजा, जिन्होंने ने पलक झपकाते ही सिफारिश स्वीकार कर लिया!
उत्तराखंड की अपदस्त सरकार वहां के उच्च न्यायलय पहुंची! और यहाँ कुछ अलग हुआ! माननीय न्याधीश ने राष्ट्रपति शाशन ख़ारिज कर दी और पुराने सरकार को बहाल किया और समय दी अपनी बहुमत साबित करने के लिए! यह थोडा भिन्न था, पर जहाँ तक भारत के प्रजातंत्र की बात है; कोई खास बल नहीं मिलाने वाला था, क्यूँ, आगे चर्चा करेंगे! न्यायाधीश का तबादला भी हो गया!
२२ अप्रैल को यह ‘घमासान’ उच्तम न्यायलय में पहुच चूका था और बहस के बाद न्यायलय ने अपने विवेक में उत्तराखंड आदेश पर स्थगन लगा दिया! मुख्यमंत्री अभी दुबारा पद संभाल भी नहीं सके थे की, पुनः बनबास लेना पड़ा! परजातंत्र या इसका मजाक या भुत?
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देश में ‘फ्लोर टेस्ट’ करवाने की बात की! केंद्र यानि भाजापा मान गया! इस बिच 09 मई को उत्तराखंड हाई कोर्ट का निर्देश आया, बागी विधायक टेस्ट में भाग नहीं ले सकते! कोंग्रेस को राहत! उसी समय सुप्रीम कोर्ट पहुँच गयी, 12 बजे बहस हुई और 4 बजे निर्णय, बागी विधायक हिस्सा नहीं ले सकते!
10 मई को फ्लोर टेस्ट हुआ! कोंग्रेस की सरकार बच गयी! 11 मई को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया, राष्ट्रपति शाशन हटेग, कोंग्रेस की सरकार बहाल होगी! पर अभी सी बी आई का खेल बाकि है, क्यूंकि राज्यपाल ने आदेश दे रखा है जाँच का, मुख्य मंत्री के खिलाफ, जो पकडे गए हैं स्टिंग ओपरेशन में, विधायकों के खरीद फरोक्त में!
कहानी मजेदार नहीं है! पहले भी इस तरह की घटनाएँ घट चुकी हैं! शर्म शार होने जैसी कोई बात नहीं होती आज कल! प्रजातंत्र की हत्या की दुहाई वही देते हैं जो यह काम करते हैं! कोंग्रेस भी पहले यह काम कर चुकी है!
पूंजीवाद में ऐसा होता है, कहना काफी नहीं है! लालच, मौका परस्ती, भ्रष्टाचार तो आम बातें हैं, पर जो कानून बनाता है, उसकी यह हालत तो यही दिखाता है की नरक है यहाँ!
इस व्यवस्था में सुधार की बात करना, देश के करोडो शोषित मजदुरों और किसानॉन के साथ घात करना है और ऊपर के उदाहरणों में जो पूंजी के चाटुकार हैं, उनके साथ मिलकर लुट के माल में बटवारा मांगने जैसा है!
पूंजीवादी उत्पादन बेरोजगारी, भ्रष्टाचार पैदा करता है! मूढ़ता और अन्धविश्वाश पैसा करता है, जहाँ गुरुत्वाकर्षण के तरंगो को खोज लिया गया है! गरीबी पैदा करता है, जहाँ खरबों का उत्पाद भंडारों में सड़ता है, क्यूंकि खरीददार नहीं हैं!
रास्ता एकमात्र है; समाजवाद! यानि, उत्पादन के साधनों पर सामाजिक कंट्रोल! जमीन और बाकि हर संसाधनों पर समाज का कंट्रोल! मानव का मानव द्वारा शोषण का खात्मा! वर्ग विहीन समाज की स्थापना! औरतों का उत्पीडन बंद! बाल मजदुरी एक झटके में ख़त्म!
समाजवादी क्रांति!