बहुत सही और वैज्ञानिक विश्लेषण साथी Mukesh Aseem द्वारा.
यह सत्य है की आज का विपक्ष इस फासीवाद का विरोध करने में असमर्थ है, तथाकथित वाम भी परेशान है बुर्जुआ प्रजातंत्र, समविधान, मिडिया, आदि को मजबूत करने में!!! न्यायलय के कुछ आदेशों को लेकर ऐसे खुश होते हैं, जैसे की इनकी सत्ता स्थापित हो गयी हो और अब काम है केवल समाजवादी विकास करने की.
हमारा लक्ष्य क्या हो? एक तो क्रन्तिकारी पार्टी खड़ा करने की, क्रन्तिकारी विचारधारा के साथ, जिसका लक्ष्य सर्वहारा सत्ता हो!
दुसरे, प्रगतिशील और क्रन्तिकारी दलों, व्यक्तियों के साथ एक राष्ट्रिय फासीवाद विरोधी मंच बनाने की, खासकर इन दलों के कार्यकर्ताओं के साथ (मेरा अपना ख्याल है, नेतागण सुविधाभोगी हो चुके हैं, और इसलिए समझौतापरस्त और संशोधनवादी भी हो चुके हैं, पर यदि कुछ भी आग बचा है तो एकता बनाने में कोई दिक्कत नहीं है).
इस संघर्ष का लक्ष्य सुधार नहीं बल्कि क्रांति होगा. फासीवाद को हराकर 'सुन्दर' पूंजीवाद नहीं बल्कि समाजवाद ही लक्ष्य होगा!
यह प्रक्रिया कोई खयाली पुलाव नहीं है दोस्तों, प्रक्रिया जारी है, आप भी शामिल हों!
5.7% जीडीपी - गहराते संकट की आहट
अप्रैल-जून तिमाही में जीडीपी की दर 5.7% रही जो सवा 3 साल में सबसे कम है| मैन्युफैक्चरिंग वृद्धि दर सिर्फ 1.2% है (पर क्रय प्रबंधकों का इंडेक्स पिछले दो महीने से गिरावट दिखा रहा है!) 8 कोर सेक्टर 2.4% पर हैं, कृषि भी पहले से नीचे 2.3% है| अगर इस वृद्धि को पुराने गणना सूत्र से देखा जाये तो यह 3.5% ही है| यह हालत कम पेट्रोलियम कीमतों और दो अच्छे मानसूनों के बावजूद है|
पर यह संकट आगे और भी गहराने वाला है| क्यों?
1. नया पूँजी निवेश और घटकर 1.3% रह गया है क्योंकि बेरोजगारी, घटती आमदनी और महँगाई की मार से कराहते लोग खरीदारी में असमर्थ हैं, स्थापित उत्पादन क्षमता भी बाजार माँग से ज्यादा है| यह मुनाफा आधारित पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था द्वारा मजदूर वर्ग के शोषण का अनिवार्य परिणाम है|
2. असली बात यह कि यह वृद्धि भी सिर्फ बढे सरकारी खर्च पर आधारित है| गैर सरकारी जीडीपी दर सिर्फ 4.25% है जो पुराने सूत्र से 2% ही होगी!
3. जुलाई तक का वित्तीय घाटा 50 ख़रब रूपया है जो पूरे साल के बजट अनुमान का 92% है अर्थात अर्थव्यवस्था को चकाचक दिखाने के लिए सरकार ने पूरे साल के खर्च का अधिकाँश पहले 4 महीनों में ही कर दिया है जबकि सारे दावों के बावजूद टैक्स/गैर टैक्स आमदनी नहीं बढ़ी है| बढ़ता बजट घाटा कर्ज लेकर पूरा किया जायेगा जिससे महँगाई और मुद्रास्फीति बढ़ेगी| रिजर्व बैंक को यह मालूम है इसीलिए ब्याज दरों पर सरकार और उसमें मतभेद है|
4. सवाल यह भी कि सरकार खर्च कर कहाँ रही है क्योंकि शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिक सेवाओं पर तो खर्च कम हो रहा है और स्कूल, अस्पताल, सफाई व्यवस्थाएं सभी चरमरा रही हैं| खर्च हो रहा है हथियारों, फ़ौज, पुलिस, सरकारी महकमे पर जिसके ठेके कुछ चहेते पूँजीपतियों को मिल रहे हैं जिनकी संपत्ति इस संकट में भी बढ़ती जा रही है|
यहाँ यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि यह गहन संकट सिर्फ नोटबंदी की असफलता का नतीजा नहीं है जैसा कि कुछ बीजेपी विरोधी पर खुद भी पूँजीवादी विशेषज्ञ/राजनीतिक कह रहे हैं| यह तो पूँजीवादी व्यवस्था का अनिवार्य लाक्षणिक संकट है और नवउदारवादी नीतियों द्वारा कल्याणकारी राज्य की नौटंकी की समाप्ति से यह जनसँख्या के और बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले रहा है| यह नोटबंदी के पहले ही मौजूद था, नोटबंदी द्वारा इस संकट का कोई समाधान मुमकिन ही नहीं था; लेकिन इसने संकट के असर को और घातक बना दिया है| लेकिन इसके बगैर भी इससे बचने का कोई रास्ता नहीं था|
हालाँकि बढ़ती जीडीपी वृद्धि दर आम लोगों की जिंदगी में कोई बड़ी खुशहाली नहीं लाती क्योंकि उसका फायदा बड़े पूंजीपति घरानों को ही होता है, पर गिरती दर की आफत तो उनकी जिंदगी पर ही कहर बनकर टूटती है क्योंकि उन्हीं सरमायेदारों के हितों की हिफ़ाजतों के लिए इसका बोझ उनके ऊपर ही डाला जाता है| मेहनतकश जनता की घटती क्रय क्षमता, बढ़ती बेरोजगारी, छोटे किसानों की घटती आमदनी, निम्न मध्य वर्ग के टूटते सुनहरे सपने आर्थिक-राजनीतिक संकट को और भयंकर रूप देने वाले हैं, असंतोष और बढ़ने वाला है, लेकिन उसे सशक्त प्रतिरोध में बदलने की मजबूत ताकतें मौजूद नहीं हैं क्योंकि वर्तमान चुनावी विपक्ष गाल बजाने के अतिरिक्त कुछ करने को न तैयार है, न सक्षम है| नोटबंदी की तरह ही आगे भी ये जबानी जमा खर्च के सिवा कुछ न करेंगे|
मेक इन इंडिया से नोटबंदी तक के असफल प्रहसनों के बाद अब आशंका यही है कि फासीवादी ताकतें इस संकट से निपटने के लिए धर्म-जाति आधारित सामुदायिक वैमनस्य को और भड़काएंगी क्योंकि फ़िलहाल तो उनके पास आर्थिक संकट से निपटने का कोई और रास्ता मौजूद नहीं|
यह किसी नई त्रासद नौटंकी के लिए तैयार होने का वक्त है|
अप्रैल-जून तिमाही में जीडीपी की दर 5.7% रही जो सवा 3 साल में सबसे कम है| मैन्युफैक्चरिंग वृद्धि दर सिर्फ 1.2% है (पर क्रय प्रबंधकों का इंडेक्स पिछले दो महीने से गिरावट दिखा रहा है!) 8 कोर सेक्टर 2.4% पर हैं, कृषि भी पहले से नीचे 2.3% है| अगर इस वृद्धि को पुराने गणना सूत्र से देखा जाये तो यह 3.5% ही है| यह हालत कम पेट्रोलियम कीमतों और दो अच्छे मानसूनों के बावजूद है|
पर यह संकट आगे और भी गहराने वाला है| क्यों?
1. नया पूँजी निवेश और घटकर 1.3% रह गया है क्योंकि बेरोजगारी, घटती आमदनी और महँगाई की मार से कराहते लोग खरीदारी में असमर्थ हैं, स्थापित उत्पादन क्षमता भी बाजार माँग से ज्यादा है| यह मुनाफा आधारित पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था द्वारा मजदूर वर्ग के शोषण का अनिवार्य परिणाम है|
2. असली बात यह कि यह वृद्धि भी सिर्फ बढे सरकारी खर्च पर आधारित है| गैर सरकारी जीडीपी दर सिर्फ 4.25% है जो पुराने सूत्र से 2% ही होगी!
3. जुलाई तक का वित्तीय घाटा 50 ख़रब रूपया है जो पूरे साल के बजट अनुमान का 92% है अर्थात अर्थव्यवस्था को चकाचक दिखाने के लिए सरकार ने पूरे साल के खर्च का अधिकाँश पहले 4 महीनों में ही कर दिया है जबकि सारे दावों के बावजूद टैक्स/गैर टैक्स आमदनी नहीं बढ़ी है| बढ़ता बजट घाटा कर्ज लेकर पूरा किया जायेगा जिससे महँगाई और मुद्रास्फीति बढ़ेगी| रिजर्व बैंक को यह मालूम है इसीलिए ब्याज दरों पर सरकार और उसमें मतभेद है|
4. सवाल यह भी कि सरकार खर्च कर कहाँ रही है क्योंकि शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिक सेवाओं पर तो खर्च कम हो रहा है और स्कूल, अस्पताल, सफाई व्यवस्थाएं सभी चरमरा रही हैं| खर्च हो रहा है हथियारों, फ़ौज, पुलिस, सरकारी महकमे पर जिसके ठेके कुछ चहेते पूँजीपतियों को मिल रहे हैं जिनकी संपत्ति इस संकट में भी बढ़ती जा रही है|
यहाँ यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि यह गहन संकट सिर्फ नोटबंदी की असफलता का नतीजा नहीं है जैसा कि कुछ बीजेपी विरोधी पर खुद भी पूँजीवादी विशेषज्ञ/राजनीतिक कह रहे हैं| यह तो पूँजीवादी व्यवस्था का अनिवार्य लाक्षणिक संकट है और नवउदारवादी नीतियों द्वारा कल्याणकारी राज्य की नौटंकी की समाप्ति से यह जनसँख्या के और बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले रहा है| यह नोटबंदी के पहले ही मौजूद था, नोटबंदी द्वारा इस संकट का कोई समाधान मुमकिन ही नहीं था; लेकिन इसने संकट के असर को और घातक बना दिया है| लेकिन इसके बगैर भी इससे बचने का कोई रास्ता नहीं था|
हालाँकि बढ़ती जीडीपी वृद्धि दर आम लोगों की जिंदगी में कोई बड़ी खुशहाली नहीं लाती क्योंकि उसका फायदा बड़े पूंजीपति घरानों को ही होता है, पर गिरती दर की आफत तो उनकी जिंदगी पर ही कहर बनकर टूटती है क्योंकि उन्हीं सरमायेदारों के हितों की हिफ़ाजतों के लिए इसका बोझ उनके ऊपर ही डाला जाता है| मेहनतकश जनता की घटती क्रय क्षमता, बढ़ती बेरोजगारी, छोटे किसानों की घटती आमदनी, निम्न मध्य वर्ग के टूटते सुनहरे सपने आर्थिक-राजनीतिक संकट को और भयंकर रूप देने वाले हैं, असंतोष और बढ़ने वाला है, लेकिन उसे सशक्त प्रतिरोध में बदलने की मजबूत ताकतें मौजूद नहीं हैं क्योंकि वर्तमान चुनावी विपक्ष गाल बजाने के अतिरिक्त कुछ करने को न तैयार है, न सक्षम है| नोटबंदी की तरह ही आगे भी ये जबानी जमा खर्च के सिवा कुछ न करेंगे|
मेक इन इंडिया से नोटबंदी तक के असफल प्रहसनों के बाद अब आशंका यही है कि फासीवादी ताकतें इस संकट से निपटने के लिए धर्म-जाति आधारित सामुदायिक वैमनस्य को और भड़काएंगी क्योंकि फ़िलहाल तो उनके पास आर्थिक संकट से निपटने का कोई और रास्ता मौजूद नहीं|
यह किसी नई त्रासद नौटंकी के लिए तैयार होने का वक्त है|