Thursday, 31 August 2017

5.7% जीडीपी - गहराते संकट की आहट

बहुत सही और वैज्ञानिक विश्लेषण साथी Mukesh Aseem द्वारा.
यह सत्य है की आज का विपक्ष इस फासीवाद का विरोध करने में असमर्थ है, तथाकथित वाम भी परेशान है बुर्जुआ प्रजातंत्र, समविधान, मिडिया, आदि को मजबूत करने में!!! न्यायलय के कुछ आदेशों को लेकर ऐसे खुश होते हैं, जैसे की इनकी सत्ता स्थापित हो गयी हो और अब काम है केवल समाजवादी विकास करने की.
हमारा लक्ष्य क्या हो? एक तो क्रन्तिकारी पार्टी खड़ा करने की, क्रन्तिकारी विचारधारा के साथ, जिसका लक्ष्य सर्वहारा सत्ता हो!
दुसरे, प्रगतिशील और क्रन्तिकारी दलों, व्यक्तियों के साथ एक राष्ट्रिय फासीवाद विरोधी मंच बनाने की, खासकर इन दलों के कार्यकर्ताओं के साथ (मेरा अपना ख्याल है, नेतागण सुविधाभोगी हो चुके हैं, और इसलिए समझौतापरस्त और संशोधनवादी भी हो चुके हैं, पर यदि कुछ भी आग बचा है तो एकता बनाने में कोई दिक्कत नहीं है).
इस संघर्ष का लक्ष्य सुधार नहीं बल्कि क्रांति होगा. फासीवाद को हराकर 'सुन्दर' पूंजीवाद नहीं बल्कि समाजवाद ही लक्ष्य होगा!
यह प्रक्रिया कोई खयाली पुलाव नहीं है दोस्तों, प्रक्रिया जारी है, आप भी शामिल हों!

साथी का विश्लेषण फेसबुक पर है, पूरा पढ़ें.
5.7% जीडीपी - गहराते संकट की आहट
अप्रैल-जून तिमाही में जीडीपी की दर 5.7% रही जो सवा 3 साल में सबसे कम है| मैन्युफैक्चरिंग वृद्धि दर सिर्फ 1.2% है (पर क्रय प्रबंधकों का इंडेक्स पिछले दो महीने से गिरावट दिखा रहा है!) 8 कोर सेक्टर 2.4% पर हैं, कृषि भी पहले से नीचे 2.3% है| अगर इस वृद्धि को पुराने गणना सूत्र से देखा जाये तो यह 3.5% ही है| यह हालत कम पेट्रोलियम कीमतों और दो अच्छे मानसूनों के बावजूद है|
पर यह संकट आगे और भी गहराने वाला है| क्यों?
1. नया पूँजी निवेश और घटकर 1.3% रह गया है क्योंकि बेरोजगारी, घटती आमदनी और महँगाई की मार से कराहते लोग खरीदारी में असमर्थ हैं, स्थापित उत्पादन क्षमता भी बाजार माँग से ज्यादा है| यह मुनाफा आधारित पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था द्वारा मजदूर वर्ग के शोषण का अनिवार्य परिणाम है|
 2. असली बात यह कि यह वृद्धि भी सिर्फ बढे सरकारी खर्च पर आधारित है| गैर सरकारी जीडीपी दर सिर्फ 4.25% है जो पुराने सूत्र से 2% ही होगी!
3. जुलाई तक का वित्तीय घाटा 50 ख़रब रूपया है जो पूरे साल के बजट अनुमान का 92% है अर्थात अर्थव्यवस्था को चकाचक दिखाने के लिए सरकार ने पूरे साल के खर्च का अधिकाँश पहले 4 महीनों में ही कर दिया है जबकि सारे दावों के बावजूद टैक्स/गैर टैक्स आमदनी नहीं बढ़ी है| बढ़ता बजट घाटा कर्ज लेकर पूरा किया जायेगा जिससे महँगाई और मुद्रास्फीति बढ़ेगी| रिजर्व बैंक को यह मालूम है इसीलिए ब्याज दरों पर सरकार और उसमें मतभेद है|
 4. सवाल यह भी कि सरकार खर्च कर कहाँ रही है क्योंकि शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिक सेवाओं पर तो खर्च कम हो रहा है और स्कूल, अस्पताल, सफाई व्यवस्थाएं सभी चरमरा रही हैं| खर्च हो रहा है हथियारों, फ़ौज, पुलिस, सरकारी महकमे पर जिसके ठेके कुछ चहेते पूँजीपतियों को मिल रहे हैं जिनकी संपत्ति इस संकट में भी बढ़ती जा रही है|
यहाँ यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि यह गहन संकट सिर्फ नोटबंदी की असफलता का नतीजा नहीं है जैसा कि कुछ बीजेपी विरोधी पर खुद भी पूँजीवादी विशेषज्ञ/राजनीतिक कह रहे हैं| यह तो पूँजीवादी व्यवस्था का अनिवार्य लाक्षणिक संकट है और नवउदारवादी नीतियों द्वारा कल्याणकारी राज्य की नौटंकी की समाप्ति से यह जनसँख्या के और बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले रहा है| यह नोटबंदी के पहले ही मौजूद था, नोटबंदी द्वारा इस संकट का कोई समाधान मुमकिन ही नहीं था; लेकिन इसने संकट के असर को और घातक बना दिया है| लेकिन इसके बगैर भी इससे बचने का कोई रास्ता नहीं था|
 हालाँकि बढ़ती जीडीपी वृद्धि दर आम लोगों की जिंदगी में कोई बड़ी खुशहाली नहीं लाती क्योंकि उसका फायदा बड़े पूंजीपति घरानों को ही होता है, पर गिरती दर की आफत तो उनकी जिंदगी पर ही कहर बनकर टूटती है क्योंकि उन्हीं सरमायेदारों के हितों की हिफ़ाजतों के लिए इसका बोझ उनके ऊपर ही डाला जाता है| मेहनतकश जनता की घटती क्रय क्षमता, बढ़ती बेरोजगारी, छोटे किसानों की घटती आमदनी, निम्न मध्य वर्ग के टूटते सुनहरे सपने आर्थिक-राजनीतिक संकट को और भयंकर रूप देने वाले हैं, असंतोष और बढ़ने वाला है, लेकिन उसे सशक्त प्रतिरोध में बदलने की मजबूत ताकतें मौजूद नहीं हैं क्योंकि वर्तमान चुनावी विपक्ष गाल बजाने के अतिरिक्त कुछ करने को न तैयार है, न सक्षम है| नोटबंदी की तरह ही आगे भी ये जबानी जमा खर्च के सिवा कुछ न करेंगे|
 मेक इन इंडिया से नोटबंदी तक के असफल प्रहसनों के बाद अब आशंका यही है कि फासीवादी ताकतें इस संकट से निपटने के लिए धर्म-जाति आधारित सामुदायिक वैमनस्य को और भड़काएंगी क्योंकि फ़िलहाल तो उनके पास आर्थिक संकट से निपटने का कोई और रास्ता मौजूद नहीं|
यह किसी नई त्रासद नौटंकी के लिए तैयार होने का वक्त है|

Wednesday, 30 August 2017

Demonetisation & Capitalism

The aim of demonetisation is fulfilled, which was never to eliminate black money.
Negation of RTI on political parties' donations, obstinately refusing to disclose the names of persons holding black money in Swiss, Panama, Mauritius banks & other safe destinations, waiving off huge unpaid taxes, loans of the big capitalists, financiers are but very few examples to see how the political parties, whether in opposition or in power, are not against black money but proof of them sharing it!
Aim of demonetisation was to plunder the money of people directly. Indirect means were hiking taxes (including GST, which was instructed a decade back by IMF/WB to Congress, which failed to abide), inflation, FDI, forced rising unemployment, 'legal' corruption and various other means.
These all exercises are meant for the masters (Domestic as well as foreign) for the next bout of cheap loans and of course to meet the massive hiked expenses of these political, bureaucratic parasites, to meet their 7-Star life style, Z-Cat Security! Here, the loyalty of these political "managers" cannot be questioned.
What is to be done? As far as these criminal parasites are concerned, they know very well, what is to be done! Use religion, caste, personality cult, nationalism and all other tested Nazi/Fascist methods to divide people & if needed crush them. This is clearly visible, more pronounced than in previous governments.
What should we do? If honest, fearless and with some basic political understanding, join your own class, the class of hard working people but exploited and not the class of masters, even if paid high, where you will be used and thrown, when not needed. Don't become a sycophant and a tool in the hands of your enemy. Refrain from being a class traitor for some money.
Be part of mass revolution (Not like 1975 or 2012), where a party does not replace another, but a class replaces the previous, old rotten, parasitic class for a classless society. Revolution does not mean shear reduction in crime, corruption, unemployment, ignorance, superstition or even terrorism & war. But revolution means elimination of them and is not possible in capitalism, which breeds them for profit, the sole aim of capitalism.
Once you understand what is Historical Materialism, you will also understand that the death of capitalism is inevitable, like it itself was born after the death of monarchy or feudalism. The death of capitalism, which is a historical necessity, will pave the way for socialism. Socialism means, the end of control of all the means of production & subsistence in hands of few. The ownership of all such production process and naturally then after, the products will become social. This system 9s called socialism.
And that is revolution, which will end wage slavery, end exploitation of a man by another man.
Last point must be understood, that historical materialism does never say that the transformation of one production relation into another (Like, Capitalism into Socialism) is automatic. It needs effort by the exploited class, their unity & struggle on a revolutionary ideology and party is utmost necessary. The revolution may turn into violent one, as the old rulers use all means to defeat the revolution, including violence.
Victory to the working class, peasants. 

Saturday, 26 August 2017

समाजवाद ही क्यूँ?

समाज को झंझोड़ने में सक्षम है, कल कमजोड था और दुसरे के सहारे जीवित था और बढ़ रहा था, आने वाले कल में विलुप्त हो जायेगा. हर घटना और व्यवस्था का शुरुआत होता है, एक खास नियम के तहत बढ़ता है और अंत होता है. शुरुआत भी किसी और घटना का अंत था, और जिसका अंत हो रहा है, वह एक नयी शुरुआत है किसी और व्यवस्था या दौर का!
प्रकृति के इसी नियम को द्वंद्वात्मक नियम कहते हैं. यहाँ यह भी समझने की बात है की शुरू और अंत के बीच भी इसी नियम का पालन होता है!
चार्वाक, अरस्तु, हेगेल भी इसे समझते थे, और इसे पूर्णयता विज्ञानिक बनाने का श्री जाता है मार्क्स को!
समाज में इस नियम को हर कोई देखता है पर सही निष्कर्ष केवल क्रन्तिकारी और वैज्ञानिक समझ वाले ही निकाल सकते हैं. धार्मिक दिमाग इसका इस्तेमाल जनता को बेवकूफ बनाने के लिए करते हैं. "बड़प्पन छोटों और गरीबों की मदद करने में है! पुन्य कमायें. क्या लाये हो और क्या लेकर जाओगे? हमें ही क्यूँ नहीं दे देते? वगैरह वगैरह!"
हम इस नियम को समझ कर समाज को अगले पड़ाव की ओर अग्रसर करने के लिए करते हैं. जिस पूंजीवाद की स्थापना 500 वर्षों पहले हुई थी सामंतवाद के गर्भ से, अब वह खुद गर्भवती है और उससे समाजवाद पैदा होगा. चूँकि भगवान, अल्लाह या गौड जैसा कोई हस्ती नहीं है, यह मजदूर वर्ग और किसान द्वारा ही होगा. पैदाईशी स्वाभाविक ढंग से ना हो तो सिजेरियन करना होगा, यानि बल प्रयोग करना होगा!
यही तो मार्क्सवाद है, जिसे भगत सिंह और साथियों ने समझा था और HSRA पार्टी के द्वारा अंग्रेजों को हराकर समाजवाद की स्थापना का सपना देखा था!
क्या हम अगले समाज के लिए एकताबद्ध हों या फिर इसी समाज के सड़ांध शव में सुधार की चेष्टा करें?

Saturday, 19 August 2017

Death Of Sanitation Workers In Delhi Exposes Govt's Hypocrisy & Failure

"While sewage cleaning has become mechanised in some parts of the country, the government figures suggest nearly 8,00,000 people still work as sewage cleaners."
It further says "...nearly 23,000 men and women die in India every year doing various kinds of sanitation work."

I was talking to one of my relative in Gorakhpur, who is a big fan of the present government and its reforms. I asked him if it was same reform, which started in 1990s by the Congress government? Like they wanted to reduce government jobs, start Aadhaar Card a mandatory need for all citizens (Same in Pak & Bangladesh with the help of US Co. China too was supposed to be part of it, but soon it threw out the parasites), implement GST, bring maximum FDI, cut budget on health, education, women's safety, etc.
All was on the instructions of IMF, WB and monopoly capitalists of US/UK and allies! Can you imagine, why they are so restless not only on liquidating laws favouring workers/peasants, but want the government to reduce budget on worker's welfare measures? So that government will tax their profit minimum! They also want their unpaid loans, taxes to be waived off! They want all the public property, created by our workers over decades, to be transferred to the big private concerns.
All for profit and it is an endless process. A year back 68 oligarchs had what half the Earthians had and now it is in hands of 8 (A report by Oxfam)! In 1920s US apologists claimed that they have made enough wealth and now the unemployment & poverty will be history. We know 31 million children in US do not have the basics, forget education!
Friends, recognise your real enemies. All the bourgeois parties are nothing but paid "managers'' of the oligarchs, who are running the country, constitution is for them, all the pillars of their bourgeois democracy serve them on fat salary and facilities!
Is Socialism possible? Is vision of Bhagat Singh and his party HSRA realisable? Understand the USSR of 1917-1956 before Khrushchev and cliches, Trots, Social Democrats did treachery to the first state of the working class. A socialist society was existing, which did progress under the leadership of the workers, which gave full freedom to its own people, women, free education and health services to all, unemployment became history. It developed science, technology, industry, agriculture, arts at par with other any developed nation and when needed it defeated the biggest campaign led by Nazis, single handedly, where US/UK forces entered only after Nazis started withdrawing, to share the 'yields' of the war!
So, friends, wake up, don't remain philistines, join the rational forces, the working class, peasants who can and will lead a revolution and establish a socialist society, which is historically inevitable.
Only in a Socialist society, the exploitation of workers, be Dalit, Tribe, Minority, Women will seize! Any form of exploitation of man by man will become impossible!
Long live revolution! Workers of the world unite!

Read the full story:
http://www.indiatimes.com/news/india/sewer-story-death-of-sanitation-workers-in-delhi-exposes-the-hypocrisy-failure-of-govt-328070.html

Ravish Kumar मीडिया असली परेशानियों को क्यों नहीं दिखाता || NDTV Ravish ...







Unemployment, poverty, miseries of the working class is rising. Life has become unbearable. Humiliation has become part of life.

Farmer's sucide has risen, despite change in "definition" of their sucide by BJP government to fudge data as in case of GDP. Women are unsafe. Children are dying due criminal government.

Who is happy? Or ask in broader case, for whom is democracy? For the working class, peasants whose living conditions have become hell or the capitalists who can plunder the people legally? Yes, legally after dozens of labour laws were abolished in name of reform and nation! Farmer's land is being snatched, especially in Central India, and if they resist, police, CRPF kills them, rapes their women!

No democracy, no secularism in capitalism is possible. Even the so called sovereign status of our country is fake as through FDI, MNCs are controlling us. IMF, WB are forcing us to follow their diktat, like reforms, GST, liquidating Labour Laws, Land Acquisition Act. The government acts like manager of these big capitalists, MNCs!

Is the way out an election? BJP government formed government in Goa, Manipur after losing election, in Bihar, where the voters kicked it out outrightly, In Tamilnadu, where it has no base!

Revolution to establish the dictatorship of the working class, peasants by replacing the dictatorship of the capitalists and imperialist powers. In other words, establishing the democracy of the working class by replacing the democracy of the big capitalists!

Is this possible without the lessons learnt by success of the Bolshevik Party and their heroic building of Socialism?

There is no alternate, friends! Long live revolution! Workers of the world unite to defeat Globalised Capitalism!

Friday, 11 August 2017

अस्पताल में मौत का तांडव : जिम्मेदार कौन?

अस्पताल में मौत का तांडव : जिम्मेदार कौन?

✍ डॉ. नवमीत

डॉ. नवमीत डॉक्टर फॉर सोसाइटी ( https://www.facebook.com/dfsind/ )  से जुड़े हैं
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11 अगस्त की खबर है कि गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दिए जाने की वजह से 40 बच्चों की मौत हो गई। ये सभी बच्चे  एनएनयू वार्ड और इंसेफेलाइटिस वार्ड में भर्ती थे। जनवरी से लेकर 11 अगस्त तक इंसेफेलाइटिस की वजह से इस मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान 151 मासूमों की मौत हो चुकी है जिनमे से 40 बच्चे 10 और 11 अगस्त को मर गए। गौरमतलब है कि यह मेडिकल कॉलेज यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पूर्व संसदीय क्षेत्र में आता है। आदित्यनाथ घटना से दो ही दिन पहले इस अस्पताल का दौरा भी करके गया था। खबरों के अनुसार अस्पताल पर ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का 69 लाख का बिल बकाया था। इस वजह से कंपनी ने गुरुवार यानि 10 अगस्त को अस्पताल के लिए ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दी थी। लिक्विड ऑक्सीजन बंद होने के बाद आज सारे ऑक्सीजन सिलेंडर भी खत्म हो गए। इंसेफेलाइटिस वार्ड में दो घंटे तक अम्बू बैग का सहारा लिया गया लेकिन बिना ऑक्सीजन के यह तरीका ज्यादा देर तक कारगर नहीं हो पाया और इस तरह से सरकार की उदासीनता, अस्पताल प्रशासन की लापरवाही और कंपनी की मुनाफाखोरी की गाज अस्पताल में भर्ती बच्चों पर गिरी। बीआरडी मेडिकल कॉलेज में दो वर्ष पूर्व लिक्विड ऑक्सीजन का प्लांट लगाया गया। इसके जरिए इंसेफेलाइटिस वार्ड समेत 300 मरीजों को पाइप के जरिए ऑक्सीजन दी जाती है। इसकी सप्लाई करने वाली कंपनी पुष्पा सेल्स है। कालेज पर कंपनी का 68 लाख 58 हजार 596 रुपये का बकाया था और बकाया रकम की अधिकतम तय राशि 10 लाख रुपये है। बकाया की रकम तय सीमा से अधिक होने के कारण देहरादून के आईनॉक्स कंपनी की एलएमओ गैस प्लांट ने गैस सप्लाई देने से इनकार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि बात की बात में 40 मासूम इस मुनाफाखोर व्यवस्था की भेंट चढ़ गए।

यह भी एकदम से नहीं हुआ, बल्कि गुरुवार की शाम से ही बच्चों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया था। ऑक्सीजन की सप्लाई रुकी पड़ी थी और एक-एक कर बच्चों की मौत हो रही थी। अस्पताल के डॉक्टरों ने पुष्पा सेल्स के अधिकारियों को फोन कर ऑक्सीजन भेजने की गुहार लगाई तो कंपनी ने पैसे मांगे। तब कॉलेज प्रशासन भी नींद से जागा और 22 लाख रुपये बकाया के भुगतान की कवायद शुरू की। पैसे आने के बाद बाद ही पुष्पा सेल्स ने लिक्विड ऑक्सीजन के टैंकर को भेजने का फैसला किया है। लेकिन अब तक तो बहुत देर हो चुकी थी और 40 बच्चे भी मर चुके थे। यह खबर आने तक कहा जा रहा था कि यह टैंकर शनिवार की शाम या रविवार तक ही अस्पताल में पहुंच पायेगा। मौत के ऊपर लापरवाही और लालच का यह खेल भी नया नहीं है, पिछले साल अप्रैल में भी इस कंपनी ने 50 लाख बकाया होने के बाद इसी तरह ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दी थी।

दूसरी तरफ सरकार और प्रशासन का रुख भी इस मामले में बेहद शर्मनाक रहा। हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार अस्पताल के डॉक्टरों ने प्रशासनिक अधिकारियों को संकट की जानकारी दी और मदद मांगी। मगर जिले के आला अधिकारी बेपरवाह रहे। वार्ड 100 बेड के प्रभारी डॉ. कफील खान के बार बार फोन करने के बाद भी किसी बड़े अधिकारी व गैस सप्लायर ने फोन नहीं उठाया तो डॉ. कफील ने अपने डॉक्टर दोस्तों से मदद मांगी और अपनी गाड़ी से ऑक्सीजन करीब एक दर्जन सिलेंडरों को ढुलवाया। उनकी कोशिशों के बाद एसएसबी व कुछ प्राइवेट अस्पतालों द्वारा कुछ मदद की गई। सशस्त्र सीमा बल के अस्पताल से बीआरडी को 10 जंबो सिलेंडर दिए गए। लेकिन अभी भी स्थिति भयावह थी और ज्यादा मौतें होने की सम्भावना बनी रही थी।

बीमारी का यह हमला आकस्मिक नहीं था। इंसेफेलाइटिस की वजह से हर साल हमारे देश में हजारों बच्चे मर जाते हैं। यह बीमारी हर इसी मौसम में अपना कहर ढाती है। 1978 से अब तक इंसेफेलाइटिस अकेले पूर्वांचल में 50 हजार से अधिक मासूमों को लील चुकी है। 2005 में इसने महामारी का रूप लिया था। तब अकेले बीआरडी मेडिकल कालेज में 1132 मौतें हो गई थीं। मई 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए अभियान शुरू किया था। मोदी की तारीफों के पुल बांधते हुए आदित्यनाथ ने घोषणा की थी कि मोदी के आशीर्वाद से पोलियो और फ़ाइलेरिया की तरह इंसेफेलाइटिस को भी खत्म कर दिया जायेगा। लेकिन हुआ ये कि जो बच्चे बच सकते थे उनकी एक तरह से हत्या कर दी गई। अब गोरखपुर के डीएम राजीव रौतेला ने घटना की जांच की बात कही है। जाहिर है जब तक जाँच होगी तब तक हमेशा की तरह इस मामले को भी फाइलों के नीचे दबाया जा चुका होगा।

और यह सिर्फ गोरखपुर या इस एक अस्पताल की बात नहीं है। पूरे ही देश में स्वास्थ्य सेवाओं का यही हाल है। जनता को हर तरह की स्वास्थ्य सेवा देने की जिम्मेदारी होती है सरकार की। लेकिन अव्वल तो सरकार यह करती नहीं है और कुछ सरकारी अस्पताल जो ठीक ठाक काम करते भी थे उनकी हालत भी अब बद से बदतर होती जा रही है। पिछले दो दशक में आर्थिक सुधारों और नवउदारवादी नीतियों के चलते यहाँ हर क्षेत्र की तरह जनस्वास्थ्य की हालत भी खस्ता हो चुकी है। सरकार लगातार इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढाती जा रही है। अब पूंजीपति तो कोई भी काम मुनाफे के लिए ही करता है तो साफ है कि स्वास्थ्य सेवाएँ महँगी तो होनी ही हैं। और महँगी होने के बाद भी जान नहीं बचती। परिणाम हमारे सामने है। किस तरह मुनाफे के लिए पुष्पा सेल्स नाम की इस कंपनी ने 40 बच्चों की जान ले ली है। लेकिन साथ में सरकार और प्रशासन भी बराबर जिम्मेदार है।

बहरहाल अच्छे दिनों, भारत निर्माण, इंडिया शाइनिंग के लोकलुभावने नारे देने वाली और लव जिहाद, गौहत्या जैसे साम्प्रदायिक मुद्दे उछालने वाली सरकारों को आम आदमी की सेहत का कोई ख्याल नहीं रहता है। पहली बात तो ऑक्सीजन या दवाओं या फिर किसी भी जरूरी सामान की उपलब्धता सरकार को ही सुनिश्चित करनी चाहिए और अगर नहीं करती है तो इस उपलब्धता को सुनिश्चित के लिए जरुरी बजट हर हाल में उपलब्ध होना चाहिए। साथ में यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि यह बजट सही समय पर सही जगह लग जाए। लेकिन इनमें से कोई भी चीज नहीं होती और इसी तरह से मरीज मौत का शिकार हो जाते हैं। बजट की बात करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार किसी भी देश को अपनी जीडीपी का कम से कम 5 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य क्षेत्र में लगाना चाहिए। भारत की सरकारों ने पिछले दो दशक के दौरान लगातार 1 प्रतिशत के आसपास ही लगाया है। 11वीं पंचवर्षीय योजना में 2 प्रतिशत का लक्ष्य रखा गया था और केवल 1.09 प्रतिशत ही लगाया गया। 12वीं योजना के पहले सरकार ने उच्च स्तरीय विशेषज्ञों का एक ग्रुप बनाया था जिसने इस योजना में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जीडीपी का 2.5 प्रतिशत निवेश करने की सिफारिश की थी लेकिन सरकार द्वारा लक्ष्य रखा सिर्फ 1.58 प्रतिशत। पिछले बजट में भी यह डेढ़ प्रतिशत के आसपास ही रहा है। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र द्वारा किया गया निवेश इस क्षेत्र में किये गए कुल निवेश का 75 प्रतिशत से भी ज्यादा है। पूरी दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं के अंतर्गत निजी क्षेत्र की होने वाली सबसे बड़ी भागीदारियों में एक नाम भारत का भी है। जाहिर है कि निजी क्षेत्र की ये कंपनियां लोगों के स्वास्थ्य की से खेलते हुए पैसे बना रही हैं। इनकी दिलचस्पी लोगों के स्वास्थ्य में नहीं बल्कि अपने मुनाफे में होती है और जब इनको लगता है कि मुनाफा कम होने लगा है या उसमें कोई अडचन आ गई है तो ये ऐसा ही करती हैं जैसे इन्होने गोरखपुर के इस अस्पताल में किया। और यह सब सरकार की शह पर होता है।

इसके अलावा देश के हर नागरिक हो स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिए। सही समय पर सही अस्पताल, डॉक्टर और इलाज मुहैया हो यह जिम्मेदारी भी सरकार की ही है। मानकों के अनुसार हमारे देश में हर 30000 की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, हर एक लाख की आबादी पर 30 बेड वाले एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और हर सब डिविजन पर एक 100 बेड वाला सामान्य अस्पताल होना चाहिए लेकिन यह भी सिर्फ कागजों पर है। और यह कागजों के मानक भी सालों पुराने हैं जिनमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। बदलाव करना तो दूर की बात है इन्हीं मानकों को सही ढंग से लागू नहीं किया जाता जबकि पिछले दो दशक में कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट और कॉर्पोरेट अस्पताल जरुर उग आये हैं जिनमें जाकर मरीज या तो बीमारी से मर जाता है या फिर इनके भारीभरकम खर्चे की वजह से। अब सरकार एक और शिगूफा लेकर आई है, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप। मतलब सरकार अब प्राइवेट कंपनियों के साथ सहकारिता करेगी और लोगों को अन्य सेवाओं के साथ स्वास्थ्य सेवाएँ भी उपलब्ध करवाएगी। यह शिगूफा और कुछ नहीं बल्कि पुष्पा सेल्स जैसी कंपनियों को मुनाफा देने की कवायद है ताकि ये पैसे बना सकें और समय आने पर इस मामले की तरह लोगों की जान से खेल सकें।

बहरहाल बात ये है कि इन बच्चों सहित इस देश में रोज होने वाली ऐसी मौतों, जिनको रोका जा सकता था, के लिए मुनाफे पर आधारित यह व्यवस्था जिम्मेदार है। साथ में जिम्मेदार है इस देश की सरकारें जो कहने को तो इस देश की हैं लेकिन काम वे करती हैं पूंजीपतियों के लिए। किस तरह से इस मानवद्रोही व्यवस्था को खत्म किया जाये यह आज के समय का सबसे बड़ा सवाल है और इसका जवाब हम सबको ही ढूँढना होगा ताकि इस तरह से मासूमों की बलि न चढ़ सके।