"ममता बनर्जी, मायावती, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, लालूप्रसाद यादव, चन्द्रबाबू नायडू, उमर अब्दुल्ला, अरविन्द केजरीवाल को ज़रा एक मिनट के लिए दृश्य से हटा दें और फिर देखें कि इनकी पार्टियों की तसवीर कैसी दिखती है? ये नेता न हों तो ये पार्टियाँ किस बूते आगे बढ़ेंगी, चुनाव लड़ और जीत सकने लायक़ बचेंगी. इन नेताओं को छोड़ दें तो न इन पार्टियों के पास नेता दिखते हैं, न मुद्दे और न पार्टी के टिके रहने का कोई आधार."
http://raagdesh.com/cult-politics-in-india/
सामयिक ज्वलंत मुद्दा! वैसे भक्ति काल क्या हिटलर के समय नहीं था? लेखक ने अच्छा प्रश्न उठाया है, ..." ये नेता न हों तो ये पार्टियाँ किस बूते आगे बढ़ेंगी, चुनाव लड़ और जीत सकने लायक़ बचेंगी." बल्कि प्रश्न ज्यादा असरदार होगा यदि यह पूछे कि यदि ये चहरे न हो तो पूंजीवाद चलेगा की नहीं? पूंजीवाद के पास और भी कई हथियार हैं, मजदुर वर्ग को बरगलाने के लिए, मसलन, धर्म, देश और जाति, आदि! ये सारे दल चलेंगे, चुनाव भी जीतेंगे, क्युकी किसी को हारना भी तो है, और दुसरे चेहरे आयेंगे! कमी नहीं है 'टैलेंटेड' चाकरों, दलालों की जो पूरी निष्ठां से पूंजीपतियों की सेवा करने के लिए! बदले में इन्हें आलिशान बंगला, मुफ्त खाना, सूट, गाड़ी, हवाई यात्रा यानि 7 सितारा सुविधा, जेड सुरक्षा! ऊपर से भारी भरकम वेतन, सत्ता, शान, प्रचार, और खुद के लिए भी निचले स्तर के चमचे! चाहे तो भारी मात्र में देशी और विदेशी धन, देशी और विदेशी बैंक में! व्यक्तिवाद का विरोध करें! यह सामंती कुरीति है, जिसे पूंजीवाद ने बचाया, उसका ज्यादा बृहद रूप में पुनुरुत्पादन किया! इसका अंत समाजवाद में ही संभव है, जहाँ बेरोजगारी इतिहास होगा, हर व्यक्ति महत्वपूर्ण होगा और हर इंसान को अपना व्यक्तित्व को बुलुन्दी पर ले जाने का अवसर मिलेगा!
http://raagdesh.com/cult-politics-in-india/
सामयिक ज्वलंत मुद्दा! वैसे भक्ति काल क्या हिटलर के समय नहीं था? लेखक ने अच्छा प्रश्न उठाया है, ..." ये नेता न हों तो ये पार्टियाँ किस बूते आगे बढ़ेंगी, चुनाव लड़ और जीत सकने लायक़ बचेंगी." बल्कि प्रश्न ज्यादा असरदार होगा यदि यह पूछे कि यदि ये चहरे न हो तो पूंजीवाद चलेगा की नहीं? पूंजीवाद के पास और भी कई हथियार हैं, मजदुर वर्ग को बरगलाने के लिए, मसलन, धर्म, देश और जाति, आदि! ये सारे दल चलेंगे, चुनाव भी जीतेंगे, क्युकी किसी को हारना भी तो है, और दुसरे चेहरे आयेंगे! कमी नहीं है 'टैलेंटेड' चाकरों, दलालों की जो पूरी निष्ठां से पूंजीपतियों की सेवा करने के लिए! बदले में इन्हें आलिशान बंगला, मुफ्त खाना, सूट, गाड़ी, हवाई यात्रा यानि 7 सितारा सुविधा, जेड सुरक्षा! ऊपर से भारी भरकम वेतन, सत्ता, शान, प्रचार, और खुद के लिए भी निचले स्तर के चमचे! चाहे तो भारी मात्र में देशी और विदेशी धन, देशी और विदेशी बैंक में! व्यक्तिवाद का विरोध करें! यह सामंती कुरीति है, जिसे पूंजीवाद ने बचाया, उसका ज्यादा बृहद रूप में पुनुरुत्पादन किया! इसका अंत समाजवाद में ही संभव है, जहाँ बेरोजगारी इतिहास होगा, हर व्यक्ति महत्वपूर्ण होगा और हर इंसान को अपना व्यक्तित्व को बुलुन्दी पर ले जाने का अवसर मिलेगा!