Sunday, 11 December 2016

Dec 11 राजनीति का ‘भक्ति काल’

"ममता बनर्जी, मायावती, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, लालूप्रसाद यादव, चन्द्रबाबू नायडू, उमर अब्दुल्ला, अरविन्द केजरीवाल को ज़रा एक मिनट के लिए दृश्य से हटा दें और फिर देखें कि इनकी पार्टियों की तसवीर कैसी दिखती है? ये नेता न हों तो ये पार्टियाँ किस बूते आगे बढ़ेंगी, चुनाव लड़ और जीत सकने लायक़ बचेंगी. इन नेताओं को छोड़ दें तो न इन पार्टियों के पास नेता दिखते हैं, न मुद्दे और न पार्टी के टिके रहने का कोई आधार."

http://raagdesh.com/cult-politics-in-india/

सामयिक ज्वलंत मुद्दा! वैसे भक्ति काल क्या हिटलर के समय नहीं था? लेखक ने अच्छा प्रश्न उठाया है, ..." ये नेता न हों तो ये पार्टियाँ किस बूते आगे बढ़ेंगी, चुनाव लड़ और जीत सकने लायक़ बचेंगी." बल्कि प्रश्न ज्यादा असरदार होगा यदि यह पूछे कि यदि ये चहरे न हो तो पूंजीवाद चलेगा की नहीं? पूंजीवाद के पास और भी कई हथियार हैं, मजदुर वर्ग को बरगलाने के लिए, मसलन, धर्म, देश और जाति, आदि! ये सारे दल चलेंगे, चुनाव भी जीतेंगे, क्युकी किसी को हारना भी तो है, और दुसरे चेहरे आयेंगे! कमी नहीं है 'टैलेंटेड' चाकरों, दलालों की जो पूरी निष्ठां से पूंजीपतियों की सेवा करने के लिए! बदले में इन्हें आलिशान बंगला, मुफ्त खाना, सूट, गाड़ी, हवाई यात्रा यानि 7 सितारा सुविधा, जेड सुरक्षा! ऊपर से भारी भरकम वेतन, सत्ता, शान, प्रचार, और खुद के लिए भी निचले स्तर के चमचे! चाहे तो भारी मात्र में देशी और विदेशी धन, देशी और विदेशी बैंक में! व्यक्तिवाद का विरोध करें! यह सामंती कुरीति है, जिसे पूंजीवाद ने बचाया, उसका ज्यादा बृहद रूप में पुनुरुत्पादन किया! इसका अंत समाजवाद में ही संभव है, जहाँ बेरोजगारी इतिहास होगा, हर व्यक्ति महत्वपूर्ण होगा और हर इंसान को अपना व्यक्तित्व को बुलुन्दी पर ले जाने का अवसर मिलेगा!

Friday, 9 December 2016

क्या हम एक मुर्दा समाज में रह रहें हैं जिसे सब कुछ सहन करने की आदत पड़ चुकी है?

असहमत! समाज जीवित है! हर रोज किसी न किसी कोने में विरोध का आवाज बुलुंद हो रहा है! उनकी रैली तो देखो, जो महीने या फिर दो महीने पर होती है, किसी राज्य या देश स्तर पर भी, लाखों मजदुर और किसान जमा हो जाते है! और यह लोग भाजपा या कोंग्रेस की भीड़ से अलग हैं, पैसे के लिए नहीं आते, बदलाव का हिस्सा बनाने के लिए आते है!
हाँ, दो सवाल हैं? समाज कहाँ ढूंड रहे हो? मध्यम वर्गीय जनता के बीच या फिर बड़े महल में रहने वाले पूंजीपति या उनके खिदमतगार? देखो समाज को मजदुर वर्ग और किसानों के बीच! मुझे मालूम है आप भी उन्हें ही ढूंड रहे हैं!
दूसरा, हमारे 'समाज' का नेत्रित्व किसके हाथ में है? दुर्भाग्य की नेत्रित्व 'वाम' के हाथ में होने के बावजूद पूंजी के लिए ही काम कर रहा है!
मजदुर वर्ग दुनिया में अबतक सबसे विकसित वर्ग है, क्रांति के लिए सबसे उपयुक्त वर्ग, वैसे कोई दूसरा कर भी नहीं सकता! जरुरत है, उसे जागरूक करने की, शिक्षित करने की, एकताबद्ध करने की! क्रन्तिकारी उफान आने पर सही नेत्रित्व क्रांति को सही मुहीम ओअर पहूँचाने में सफल होगा!
दुनिया में मजदुर एक हो!