Thursday, 30 March 2017

2017 चुनाव: एक विश्लेषण

2017 चुनाव के परिमाण आ चुके हैं. आशा के अनुसार या विपरीत परिणाम है? निर्भर करता है कौन जीता कौन हारा. भाजपा विजयी हुयी है 2 राज्यों में, हारी २ राज्यों में (नए कानून बनाने वालों की खरीद हुयी अकानुनन तरीके से और सत्ता में आई भाजपा यहाँ भी), समाप्त हो गयी 1 राज्य में.
अति संक्षिप्त में कहें तो आंकड़ों का खेल है चुनाव. किसी भी दल का वर्चस्व नहीं है जनता पर, जो खंड खंड में बंटी है, जिसे ‘वोट बैंक’ या ‘सामाजिक आधार’ कहते हैं. पैसे और सत्ता का चेहरा है, पर इस आधार पर ठप्पा है धर्मजातिक्षेत्र का! जनता विभाजित है. यह ठप्पा भी काम करता है जनता को बांटने में! शाषक वर्ग, सारे अंतर्द्वंद के बावजूद, काबिज है सत्ता पर!
जनता का कहीं से अधिकार नहीं है राजनितिक दलों पर, उनपर भी नहीं जिसको इसना चुना है! यही स्वरूप है बुर्जुआ प्रजातंत्र का.
इस बिच मजदुर वर्ग और किसान के हालत और खस्ता हो रहे हैं! सुधार का मतलब एक ही होता है, मजदुर वर्ग का अधिक शोषण. श्रम कानूनों को ध्वस्त करना, किसानों के जमीन को लुटने के कानून को सरल बनाना! फ़्रांस के इन्ही ‘सुधार’ का विरोध करने के लिए 10 लाख से अधिक मजदुर सड़क पर थे! यह विरोध अमेरिका, ग्रीस, लैटिन अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका में भी दिखा. क्रांतिकारी विचारधारा और पार्टी ना होने से बिखर गए.
पिछला बिहार चुनाव यानी आंकड़ो के खेल का बहुत सही उदहारण था! ‘वोट बैंक’ का सही समीकरण किया गया और भाजपा ध्वस्त हो गयी. एकता, भले ही बुर्जुआ दलों के बीच हो, क्षेत्रिय दलों के बीच हो, पर एक राष्ट्रिय दल की मिटटी पलीद कर सकती है, ‘व्यक्तिवाद’ के लहर की हवा निकाल सकती हैं! राजद, जदयू और कोंग्रेस का महा गठबंधन जीत गया था!
यूपी और उत्तराखंड भी अपवाद नहीं होता! हाँ, कुछ हद तक Anti Incumbancy का असर भी हो सकता था. पर हुआ नहीं, विपक्ष 60% वोट लेकर भी ध्वस्त हो गया! जनता शोषण का विरोध चुनाव के जरिये भी करती है, पर धाक् के तिन पात; पहले हारे हुए दल सत्तासीन हो जाते हैं. कौंग्रेस की वापसी (पंजाब) यही दिखाता है. गोवा में भाजपा की हार और सिकुड़ती हुयी वोट बैंक इसी का उदहारण है!
वाम का क्या हुआ? बुर्जुआ चुनाव को ही लक्ष्य मान लेना, या उसी आधार पर सर्वहारा क्रांति का दिवा स्वप्न देखनेवालों का यही हाल होना था! इस हार की समीक्षा मार्क्सवादी लेनिनवादी तरीके से करना तो दूर, वह बुर्जुआ तरीके से भी शायद ही कर पायें! जाति समीकरण, लुभावने नारे और वादाएं, ‘जितने योग्य’ उम्मीदवार, धर्म, देशवाद, व्यक्तिवाद आदि ही तो आधार है आज के चुनाव में जित के लिए. हाँ, भारी पूंजी की भी जरुरत है! इनके लिए वर्ग संघर्ष, सर्वहारा अधिनायकत्व तो किताबों में है और आज के युग में पुराने पड गए हैं!
इनका नेत्रित्व सुविधा भोगी हो चूका है. लोकसभा से मुखिया तक इनके जीते नेता ‘इमानदारी’ से सरकारी सुविधा लेते रहे हैं. इनके मध्यम आधार के कार्यकर्त्ता चंदा उगाही करने में महारथ हासिल की थी, खासकर वहां, जहाँ इनकी सरकार थी! सड़क पर आना और वर्ग संघर्ष की बात करना कठिन हो गया. यह सुविधा परस्ती संशोधन वाद लाया, क्रांति की जगह सुधार लाया, समाजवाद के जगह ‘प्रजातान्त्रिक समाजवाद’ आ गया. यानि पूंजी या निजी पूंजी को हटाने की बात ख़त्म कर दी गयी, श्रम दासता स्वाभाविक लगने लगा. समाजवाद में भी विपक्षी दलों की बात की गयी ताकि मजदुर वर्ग की “तानाशाही” ना आ सके, ‘प्रजातंत्र’ बहाल रहे!!!!! आम आदमी पार्टी ने तक़रीबन इनकी जगह ले ली. वह ‘मजदुर वर्ग’ की जगह ‘आम आदमी’ की बात करते हैं!
2017 चुनाव पर वापस आते हैं. मुख्य मुद्दा ‘विकास’ था, जो फर्जी जीडीपी पर सवार था. वैसे उसे भी हटाना पड़ा, क्यूंकि भाजपा और अन्य दलों को भी लग गया की यह मुद्दा अब काम नहीं कर रहा है! धार्मिक उन्माद, देशावाद, जाति, व्यक्तिवाद आदि का इस्तेमाल हुआ! पैसे, शराब, और नार्तिकियों के भौंडे गाने और नृत्य भी भारी संख्या में किये गए ताकि भीड़ जुटाई जा सके, वोट पाया जा सके. अरबों रुपये खर्च हुए.
इवीएम् में भी हेरा फेरी की शंकाए हैं पर फासीवाद का खतरा हो या नैतिक मूल्य खोने का कारन हो, विपक्ष ने इस मुद्दे पर कोई ख़ास आवाज़ नहीं उठाई!
मिडिया ने भी ‘बखूबी’ अपना रोल निभाया. इसपर इतना कहना पर्याप्त होगा कि मिडिया एक व्यवसाय है, जिसका दुहरा चरित्र है. मुनाफे के आलावा यह प्रचार (खास वर्ग के लिए) में भी मुख्य हिस्सेदारी रखता है. इसमे पैसे लगाने वाले भला मजदुर वर्ग के हित की क्यूँ चर्चा करेंगे? कुछ ‘वामपंथी’ और ‘प्रगतिशील’ लोग खुश हो जाते हैं रविश कुमार और उनके जैसे पत्रकारों से.

एक क्रांतिकारी पार्टी क्या करे?
फासीवाद अब एक लक्षण नहीं रह गया है. यह हमारे बीच में है! जर्मनी का फासीवाद या नाजियों का नंगा नाच भले ही न दिखे, पर अब अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, महिलायों को देखें. क्या खाए, क्या पहने भी अब समाज के कुछ ‘चुने’ दलाल तय कर रहे हैं! राज्य इन दलालों के साथ है. नास्तिक विचारधारा, गो मांस, रोजगार मांगना, युद्ध का विरोध करना अब अपराध बन गया है. पुलिस, प्रशाशन का चरित्र तो मालूम ही था, न्यायपालिका भी इनके रंग में रंग चूका है! 90% विकलांग साईं बाबा और साथियों, मरुतो उद्योग लिमिटेड के मजदूरों को बिना सबुत के उम्र कैद की सजा दी गयी. वहीँ अम्बानी के विरुद्ध ऍफ़आइआर को कानून में संशोधन कर खारिज कर दिया गया!
2017 का चुनाव ख़ामोशी से नहीं, चीख चीख के पुकार रहा है क्रन्तिकारियों को, मजदुर वर्ग के अगुआ दस्ते को, शोषित वर्गों को, युवकों को; जागो, देखो, समझो इस फासीवाद के खुनी हाथ को, इसके भयानक लक्ष्य को. इसकी सारी साजिश को, जो पुन्जिपतियों के मुनाफे को बढ़ाना है, मजदुर वर्ग और किसान को लुटना है.



हमारी एकता और संघर्ष एक क्रांतिकरी समझ के साथ ही फासीवाद को हरा सकता है! साथ साथ यह भी स्पष्ट हो की आज का मुख्य संघर्ष श्रम और पूंजी का है! यानी हमारी लडाई फंसिवाद को ही हराना नहीं, बल्कि इसकी जननी पूंजीवाद को भी हराना है. समाजवाद की स्थापना करना है! हर शोषण को ख़त्म करना है!  

Tuesday, 28 March 2017

PDYF: आज छात्रों-युवाओं का नारा

एक प्रगतिशील-जनवादी अखिल भारतीय युवा संगठन का गठन करने हेतु विभिन्न राज्यों के युवा संगठनों द्वारा आयोजित किया गया अखिल भारतीय सम्मेलन। 23 अप्रैल, 2017 को पटना के 'बिहार राज्य पंचायत परिषद' हॉल में।

आह्वांकर्ता: PDYF (Bengal), NAYA (Bihar), PDYF (Punjab), NAYA (Delhi), Abhiyaan (UP).

आज छात्रों-युवाओं का नारा होना चाहिए
छात्रों-युवाओं को सौ प्रतिशत रोजगार की गारंटी दो, नहीं तो न्यूनतम 10000 रूपये का बेरोजगारी भत्ता दो।
गरीब परिवारों के युवाओं, गरीब किसानों, गरीब छोटे दुकानदारों व व्यापारियों को ब्याज़ मुक्त लोन दो।
सौ प्रतिशत मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा दो, सम्मानजनक रोजगार दो।
युवाओं को नौकरी देने के नाम पर "हायर ऐंड फायर" और "ठीकेदारी प्रथा" की भट्ठी में झोंकना बन्द करो।
बड़े पूंजीपतियों को कर्जमाफी की सौगात देना बंद करो।
आज के बेरोजगार युवा कल के मज़दूर, किसान, कामगार, कर्मचारी, छोटे दुकानदार-व्यापारी, शिक्षक, आदि हैं, इनका दमन बन्द करो।
आज के युवा कल के मज़दूर हैं, इनका फासिस्ट दमन-उत्पीड़न करने के लिए नये क़ानून बनाना बन्द करो
- पटना आल इंडिया युवा कांफ्रेंस तैयारी समिति

Friday, 24 March 2017

A letter from the jailed workers of Maruti Suzuki. 23 March 2017





Judiciary has removed its mask to side fascism, like police, bureaucracy, politicians and media!
Unity & struggle to defeat fascism and abolish the root cause of all evils, capitalism, is the tactics & strategy of the present era!

Thursday, 23 March 2017

मानवाधिकार का उल्लंघन

दुर्भाग्य यह नहीं है की 'मानवाधिकार' का उल्लंघन होता आ रहा है, भारत में, विदेशों में भी! बल्कि हम इसके तह में नहीं जा पा रहे हैं! 1977 और 2012 के भी आन्दोलन सत्ता परिवर्तन का ही था, बुर्जुआ वर्ग के एक राजनितिक घटक का दुसरे घटक के द्वारा!
मानवाधिकार केवल राजनितिक ही नहीं, आर्थिक, सामाजिक भी है. मानव मानव की तरह रहने के लायक हो. रोजगार, घर, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदि का हकदार हो! जो नदारद है.
सब के जड़ में क्या है? सत्ता का आधार, राजनीती, अर्थ निति किसके लिए काम कर रहे हैं?. देश के सारे प्राकृतिक संसाधन, उत्पादन के साधन चंद लोगों (1-2%) के हाथ में है. उनके लिए ही राज्य और बाकि सारे तथाकथित प्रजातंत्र के 'खम्भे' काम कर रहे हैं. 
विरोध होने पर धर्म, देश, व्यक्तिवाद का रूप लेता है 'इनका' प्रजातंत्र! फिर शुरू होता तांडव नृत्य. शोषण के खिलाफ विद्रोह को दबाने के लिए शाशन तो हमेशा ही चलता रहता है, कभी कम, कभी ज्यादा. 
जरुरत है, इस आधार को ख़त्म करना. उत्पादन के साधन को निजी स्वामित्व से मुक्त करना. उत्पादक शक्तियों को मुक्त करना, जो अब पूंजीवाद में बंदी है, मुनाफे नामक राक्षस के हाथ में. उत्पादन मुनाफे के लिए नहीं बल्कि समाज के हर सदस्य के उपभोग के लिए.
मानव अधिकार वर्गोपरी नहीं है! सर्वहारा वर्ग के नेत्रित्व में वर्गविहीन समाज संभव है और फिर शोषण का आधार ख़त्म होगा. सही मानवाधिकार तभी संभव है! 
अति संक्षिप्त में पूंजीवाद (अभी यह फासीवाद का रूप ले चूका है) का खात्मा और समाजवाद की स्थापना!

Thursday, 16 March 2017

अन्याय और लडाई!

हर तरफ़ अन्‍याय और झूठ का ही बोलबाला हो तो क्‍या करें?
न्‍याय और सच्‍चाई के लिए लड़ो!
(किसके साथ लड़ें? मजदुर वर्ग, किसान, दलित, महिला, अल्पमत और बाकि सभी शोषित वर्ग!)
इस लड़ाई की दिशा, रास्‍ता या तरीक़ा ग़लत हो जाये तो?
तो फिर सोचो, अध्‍ययन करो, विचार-विमर्श करो और उसे ठीक करो।
इस लड़ाई में यदि हम पराजित हो जायें तो?
तो हार से सबक़ लो, तैयारी करो और फिर लड़ो।
फिर भी यदि नाक़ाम रहे तो?
फिर से तैयारी करो। फिर से लड़ाई छेड़ो।
और यदि ज़ि‍न्‍दगी की आखिरी साँस तक कामयाब न हो सके तो?
अगली पीढ़ी को लड़ाई जारी रखने के लिए कहकर वीरोचित आत्‍मगौरव के साथ ज़ि‍न्‍दगी को अलविदा कहो!

(By Kavita Krishnapallavi)

Saturday, 11 March 2017

Present era & task of the Left

Quoting Marx, Engels, Lenin, Stalin, Enver hoxha is one thing and being a Marxist Leninist is another!
There are Marxists and there are Marxists, which leads to even Trotskyism, Titoism, Anarchism, Social democracy, etc. By quoting same paragraph, one deducts that now on electoral revolution will only succeed, while other deducts that only violent revolution will succeed!
In India and many other undeveloped countries, these Marxists conclude that we need Democratic revolution, while others are for Socialist revolution. These two different paths will decide which class to lead and which class to come in support during revolution. What should be immediate tactics and strategies.
This outcome may not be due sheer opportunism but even due ignorance, not able to grasp the law of revolution in totality.
What is to be done? Discussion in study circles, reading more, joining working class for practical, self criticism!
Comrades, get out of the shell we are in, out of philistinism. Right's march, since the 'retreat of rise of working class all over EU, US, Latin America and even Africa and Asia in 2008' is painful. Fascism, not in its classical form, but in the latest one is already among us. US, India, Ukraine are the few examples.
Unity & struggle was the need for the proletarian revolution but now its is additionally needed for our very survival! Historical task of this revolution is crying loud enough to be heard even by the bourgeois apologists but what about us, the Left leaders, ideologues?

Tuesday, 7 March 2017

How Nepali Women Are Forced To 'Sell' Their Skin T...

Poem: How Nepali Women Are Forced To 'Sell' Their Skin T...: How Nepali Women Are Forced To 'Sell' Their Skin To Make Rich Indians Beautiful : Poorest of poor villages in Nepal have become skin...





"The agents higher up in the ladder, sell it to various small pathological labs where the tissue is processed. The processed tissue is supplied to bigger labs (some of them are quite reputed) with a licence to export biological derivatives to the US. In the US, these derivatives are developed into Alloderm or similar product, used in various aesthetic surgical procedures such as penis enlargement, breast augmentation and lip augmentation for which India is a growing market."
"In comparison to the well-known trafficking in solid organs (such as kidneys), the poorest countries are the ones most likely to sell human cells and tissues to profiteers, who distribute them in high-income countries or in private clinics in emerging countries,"
Proud moment for the proponents of capitalism, based on private property! Super entrepreneurship and massive profit! Does it not hide the "Surplus Value" concept and the need of workers to create value and wealth, to their glee?
These disgusting philistines will agree to legalise the sell of human organs, like prostitution and drug trafficking to minimise the crime and corruption in society!
Today is Women's International Day!