Thursday, 21 September 2017

रावण दहन: अन्याय के खिलाफ मोर्चा या नाटक?

रावण की मूर्ति को धूम धाम से जलाना हर साल की प्रक्रिया है. बच्चे से लेकर बूढ़े तक इसका आनंद लेते हैं. कुछ इसका विश्लेषण भी करते हैं. रावण भले ही किंवदन्तियों का खलनायक हो और उसको जलाना एक प्रतिक ही हो पर यह बताया जाता है कि यह अन्याय पर न्याय की जीत है और लोगों को जोश दिलाता है!
राजनितिक नेता भी आते हैं, वही पुरानी बातें दुहराते हैं, और लोग तालियाँ बजाते हैं!
देश के हर क्षेत्र में, शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य विभाग में, न्यायलय से लेकर पुलिस और प्रशाषण में, सीबीआई से लेकर हर विभाग के खोजी/अन्वेषण गुप्त सेल तक भ्रष्ट हैं. सरकार का हर मंत्री से लेकर चपरासी तक भ्रष्ट और अपराधी हैं. 1-2 अपवाद हो सकते हैं!
महान संस्कृति और महान नेताओं और बाबाओं के देश में, दुसरे देशों में भी बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी बढ़ रहा है, इसके बावजूद की संपत्ति का बढ़ना, पर केन्द्रीयकरण भी तीव्र हुआ है.
विज्ञान और तकनिकी भी बढ़ा है, पर साथ साथ अज्ञानता और अन्धविश्वाश भी बढ़ा है. यानी दोनों ध्रुव बढ़ा (अमीरी गरीबी और ज्ञान अज्ञान) है और दोनों के बीच खायी भी बढ़ी है!
रावण को प्रतीकात्मक तरीके से जलाने या कोई और धार्मिक अनुष्ठान से हम और खाई में जा रहे हैं! गड़बड़ तो है पर इसका इलाज वहां नहीं है जहाँ हम उसे ख़त्म कर रहे हैं, वहां तो शायद भुत ही है, पर हमारे प्रयत्नों का प्रयास तो उल्टा परिणाम ही दे रहा है!
इन सामाजिक गड़बड़ियों का, बीमारी का आधार उत्पादन के तरीकों में है! उत्पादन संबंधों में है. उत्पादन समाज के अधिकांश मजदूरों/किसानों द्वारा हो रहा है और उत्पाद का मालिकाना कुछ के हाथों में है! सारे कष्टों का उत्पादन यहीं होता है!
भगत सिंह ने इसे समझा! उनकी पार्टी HSRA ने समझा. पर भारत के स्वतंत्र होने पर मालिकों/बड़े पूंजीपतियों के मैनेजर जो उस वक्त कांग्रेस पार्टी थी उसने (नेहरु, गाँधी, पटेल आदि के नेत्रित्व में), संविधान और राज्य सत्ता जनता के लिए नहीं बल्कि मालिकों के लिए बनाया!
उसी संविधान का सहारा मनमोहन सिंह ने लिआ और मजदुर वर्ग पर "सुधार" के नाम पर भयानक जुल्म की शुरुआत की और अब मोदी की सरकार ने तो जुल्म की हर परिभाषा को ही शर्मसार कर दिया. फासीवाद आज नंगा नाच कर रहा है!
स्नाक्षिप्त में अब रास्ता एक ही है साथियों. मजदुर वर्ग और किसान की सरकार. अब उनके हाथ में सत्ता नहीं देनी है जो हमारा कल्याण करें. बल्कि हम खुद ही अपने देश की हर सम्पदा को अपने हाथ में लें, खुद ही उत्पादन करे, खुद ही बंटवारा करें!
मार्क्सवाद लेनिनवाद ही वह विचारधारा है जिसके आधार पर रूस में क्रांति हुयी और एक समाजवादी समाज स्थापित हुआ. हालाँकि स्टालिन के मृत्यु के बाद गद्दारी के कारन वहां पूंजीवाद की पुनार्स्तःपना हुई और पूरा का पूरा समाजवादी खेमा ध्वस्त हो गया!
एक अति कष्टदायक सबक पर बहुत ही महत्वपूर्ण! साम्राज्यवादी पूंजीवादी सत्ता को हराने के लिए उससे भी ज्यादा मजबूत स्थिति बनानी होगी, उसके तानाशाही से ज्यादा सशक्त सर्वहारा तानाशाही करनी होगी, केन्द्रिकृत नेत्रित्व बनाना होगा, जो प्रजातान्त्रिक आधार पर होगा, ताकि दुश्मनो के हर प्रतिक्रियावादी हरकत को परस्त कर सकें, अंततः एक वर्ग विहीन समाज नबना सकें, जहाँ प्रजातंत्र और तानाशाही सत्ता बेमानीं हो जाये, मजदूरी समप्र हो जाये!
मजदूर एकता जिंदाबाद! क्रांति अमर रहे!

Thursday, 14 September 2017

Digital India without signal:What is to be done?

Digital India has destroyed my peace of mind. Its impossible to talk without multi call drops, shouting & screaming, running out of flat!
Transmission power has been reduced, while number of mobiles have increased! MTNL/BSNL towers have been 'gifted' to the private operators by their proxy government, whom they had earlier ensured victory through Billions worth money and their owned media (Not sold media & Social Media trolls as well) propaganda!
Yes, the mobile operators are making huge profit. You may call it monopoly capitalism, crony capitalism (AAP is busy curing & reforming it & calls it a 'political revolution has begun'), imperialist capitalism (Whole government has bowed in to Abe, Xi, Trump as if he is our feudal lord or god's own ....), state capitalism, fascism/nazism (form of capitalism only) or by any other name, but my peace is lost?
Are you in peace? If not, what is to be done? I have lodged 100s of complain, including personal visits but only to hear, give us time, have patience, will do something.
Some say plead/beg to the government, it will do something, like some soldiers are begging for OROP (Not me or my friends at JM, for more than 823 days) and have high hopes with the new Defense Minister, like we had earlier with former DMs, who left us in lurch!
Even, RSS ABVP, BMS doing same.
Or take Sanyas? Moh Maya (Worldly lust) is chain/bondage/slavery & teach the same to the Billions of suffering humans. Pray to nincompoop god!
Friends, nothing is working. But I know, world is changing, which is perceptible. So, do I rise in revolt with millions of other toiling masses to change the base, the mother of all evils, which is giving birth to unemployment, the criminal parasites and has enslaved us bodily and mentally?

Tuesday, 5 September 2017

Gauri Lankesh murdered by Fascists!

Senior journalist, editor and activist Gauri Lankesh, 55, was shot dead by unidentified assailants at the entrance of her home in Bengaluru West on 05th evening! She was fighting against communalism and RSS divisive acts.
Her murder is openly being celebrated by RSS supporters! 

And there are people, parties, ideologues looking forward for revolutions through parliamentary path? As if they will win Parliamentary election and the fascists, bourgeois pillars of the bloody democracy will watch you change the property relation; from capitalist mode of production to socialist mode of production!
Some try to convince you that even Lenin wanted the European Communists to participate in the bourgeois elections, even though the Parliaments had become redundant historically as far as people's democracy was concerned.
But same Lenin says, Parliament is not redundant politically and whenever possible, the Left must use it for its own promotion, for raising the class consciousness, unity & struggle. Mind it, using an institution and making that institution as the prime goal or even as the main path for the revolution differentiates between the revolutionaries & revisionists!
In today's India, revolution is a historical necessity, but any extreme, like predetermined violence or parliament path is doomed to fail. We need mass movement (under the leadership of the working class), on political line through class struggle to replace capitalism, based on exploitation, which breeds all evils, by socialism, to have a society based on equality, brotherhood and freedom!

Thursday, 31 August 2017

5.7% जीडीपी - गहराते संकट की आहट

बहुत सही और वैज्ञानिक विश्लेषण साथी Mukesh Aseem द्वारा.
यह सत्य है की आज का विपक्ष इस फासीवाद का विरोध करने में असमर्थ है, तथाकथित वाम भी परेशान है बुर्जुआ प्रजातंत्र, समविधान, मिडिया, आदि को मजबूत करने में!!! न्यायलय के कुछ आदेशों को लेकर ऐसे खुश होते हैं, जैसे की इनकी सत्ता स्थापित हो गयी हो और अब काम है केवल समाजवादी विकास करने की.
हमारा लक्ष्य क्या हो? एक तो क्रन्तिकारी पार्टी खड़ा करने की, क्रन्तिकारी विचारधारा के साथ, जिसका लक्ष्य सर्वहारा सत्ता हो!
दुसरे, प्रगतिशील और क्रन्तिकारी दलों, व्यक्तियों के साथ एक राष्ट्रिय फासीवाद विरोधी मंच बनाने की, खासकर इन दलों के कार्यकर्ताओं के साथ (मेरा अपना ख्याल है, नेतागण सुविधाभोगी हो चुके हैं, और इसलिए समझौतापरस्त और संशोधनवादी भी हो चुके हैं, पर यदि कुछ भी आग बचा है तो एकता बनाने में कोई दिक्कत नहीं है).
इस संघर्ष का लक्ष्य सुधार नहीं बल्कि क्रांति होगा. फासीवाद को हराकर 'सुन्दर' पूंजीवाद नहीं बल्कि समाजवाद ही लक्ष्य होगा!
यह प्रक्रिया कोई खयाली पुलाव नहीं है दोस्तों, प्रक्रिया जारी है, आप भी शामिल हों!

साथी का विश्लेषण फेसबुक पर है, पूरा पढ़ें.
5.7% जीडीपी - गहराते संकट की आहट
अप्रैल-जून तिमाही में जीडीपी की दर 5.7% रही जो सवा 3 साल में सबसे कम है| मैन्युफैक्चरिंग वृद्धि दर सिर्फ 1.2% है (पर क्रय प्रबंधकों का इंडेक्स पिछले दो महीने से गिरावट दिखा रहा है!) 8 कोर सेक्टर 2.4% पर हैं, कृषि भी पहले से नीचे 2.3% है| अगर इस वृद्धि को पुराने गणना सूत्र से देखा जाये तो यह 3.5% ही है| यह हालत कम पेट्रोलियम कीमतों और दो अच्छे मानसूनों के बावजूद है|
पर यह संकट आगे और भी गहराने वाला है| क्यों?
1. नया पूँजी निवेश और घटकर 1.3% रह गया है क्योंकि बेरोजगारी, घटती आमदनी और महँगाई की मार से कराहते लोग खरीदारी में असमर्थ हैं, स्थापित उत्पादन क्षमता भी बाजार माँग से ज्यादा है| यह मुनाफा आधारित पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था द्वारा मजदूर वर्ग के शोषण का अनिवार्य परिणाम है|
 2. असली बात यह कि यह वृद्धि भी सिर्फ बढे सरकारी खर्च पर आधारित है| गैर सरकारी जीडीपी दर सिर्फ 4.25% है जो पुराने सूत्र से 2% ही होगी!
3. जुलाई तक का वित्तीय घाटा 50 ख़रब रूपया है जो पूरे साल के बजट अनुमान का 92% है अर्थात अर्थव्यवस्था को चकाचक दिखाने के लिए सरकार ने पूरे साल के खर्च का अधिकाँश पहले 4 महीनों में ही कर दिया है जबकि सारे दावों के बावजूद टैक्स/गैर टैक्स आमदनी नहीं बढ़ी है| बढ़ता बजट घाटा कर्ज लेकर पूरा किया जायेगा जिससे महँगाई और मुद्रास्फीति बढ़ेगी| रिजर्व बैंक को यह मालूम है इसीलिए ब्याज दरों पर सरकार और उसमें मतभेद है|
 4. सवाल यह भी कि सरकार खर्च कर कहाँ रही है क्योंकि शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिक सेवाओं पर तो खर्च कम हो रहा है और स्कूल, अस्पताल, सफाई व्यवस्थाएं सभी चरमरा रही हैं| खर्च हो रहा है हथियारों, फ़ौज, पुलिस, सरकारी महकमे पर जिसके ठेके कुछ चहेते पूँजीपतियों को मिल रहे हैं जिनकी संपत्ति इस संकट में भी बढ़ती जा रही है|
यहाँ यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि यह गहन संकट सिर्फ नोटबंदी की असफलता का नतीजा नहीं है जैसा कि कुछ बीजेपी विरोधी पर खुद भी पूँजीवादी विशेषज्ञ/राजनीतिक कह रहे हैं| यह तो पूँजीवादी व्यवस्था का अनिवार्य लाक्षणिक संकट है और नवउदारवादी नीतियों द्वारा कल्याणकारी राज्य की नौटंकी की समाप्ति से यह जनसँख्या के और बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले रहा है| यह नोटबंदी के पहले ही मौजूद था, नोटबंदी द्वारा इस संकट का कोई समाधान मुमकिन ही नहीं था; लेकिन इसने संकट के असर को और घातक बना दिया है| लेकिन इसके बगैर भी इससे बचने का कोई रास्ता नहीं था|
 हालाँकि बढ़ती जीडीपी वृद्धि दर आम लोगों की जिंदगी में कोई बड़ी खुशहाली नहीं लाती क्योंकि उसका फायदा बड़े पूंजीपति घरानों को ही होता है, पर गिरती दर की आफत तो उनकी जिंदगी पर ही कहर बनकर टूटती है क्योंकि उन्हीं सरमायेदारों के हितों की हिफ़ाजतों के लिए इसका बोझ उनके ऊपर ही डाला जाता है| मेहनतकश जनता की घटती क्रय क्षमता, बढ़ती बेरोजगारी, छोटे किसानों की घटती आमदनी, निम्न मध्य वर्ग के टूटते सुनहरे सपने आर्थिक-राजनीतिक संकट को और भयंकर रूप देने वाले हैं, असंतोष और बढ़ने वाला है, लेकिन उसे सशक्त प्रतिरोध में बदलने की मजबूत ताकतें मौजूद नहीं हैं क्योंकि वर्तमान चुनावी विपक्ष गाल बजाने के अतिरिक्त कुछ करने को न तैयार है, न सक्षम है| नोटबंदी की तरह ही आगे भी ये जबानी जमा खर्च के सिवा कुछ न करेंगे|
 मेक इन इंडिया से नोटबंदी तक के असफल प्रहसनों के बाद अब आशंका यही है कि फासीवादी ताकतें इस संकट से निपटने के लिए धर्म-जाति आधारित सामुदायिक वैमनस्य को और भड़काएंगी क्योंकि फ़िलहाल तो उनके पास आर्थिक संकट से निपटने का कोई और रास्ता मौजूद नहीं|
यह किसी नई त्रासद नौटंकी के लिए तैयार होने का वक्त है|

Wednesday, 30 August 2017

Demonetisation & Capitalism

The aim of demonetisation is fulfilled, which was never to eliminate black money.
Negation of RTI on political parties' donations, obstinately refusing to disclose the names of persons holding black money in Swiss, Panama, Mauritius banks & other safe destinations, waiving off huge unpaid taxes, loans of the big capitalists, financiers are but very few examples to see how the political parties, whether in opposition or in power, are not against black money but proof of them sharing it!
Aim of demonetisation was to plunder the money of people directly. Indirect means were hiking taxes (including GST, which was instructed a decade back by IMF/WB to Congress, which failed to abide), inflation, FDI, forced rising unemployment, 'legal' corruption and various other means.
These all exercises are meant for the masters (Domestic as well as foreign) for the next bout of cheap loans and of course to meet the massive hiked expenses of these political, bureaucratic parasites, to meet their 7-Star life style, Z-Cat Security! Here, the loyalty of these political "managers" cannot be questioned.
What is to be done? As far as these criminal parasites are concerned, they know very well, what is to be done! Use religion, caste, personality cult, nationalism and all other tested Nazi/Fascist methods to divide people & if needed crush them. This is clearly visible, more pronounced than in previous governments.
What should we do? If honest, fearless and with some basic political understanding, join your own class, the class of hard working people but exploited and not the class of masters, even if paid high, where you will be used and thrown, when not needed. Don't become a sycophant and a tool in the hands of your enemy. Refrain from being a class traitor for some money.
Be part of mass revolution (Not like 1975 or 2012), where a party does not replace another, but a class replaces the previous, old rotten, parasitic class for a classless society. Revolution does not mean shear reduction in crime, corruption, unemployment, ignorance, superstition or even terrorism & war. But revolution means elimination of them and is not possible in capitalism, which breeds them for profit, the sole aim of capitalism.
Once you understand what is Historical Materialism, you will also understand that the death of capitalism is inevitable, like it itself was born after the death of monarchy or feudalism. The death of capitalism, which is a historical necessity, will pave the way for socialism. Socialism means, the end of control of all the means of production & subsistence in hands of few. The ownership of all such production process and naturally then after, the products will become social. This system 9s called socialism.
And that is revolution, which will end wage slavery, end exploitation of a man by another man.
Last point must be understood, that historical materialism does never say that the transformation of one production relation into another (Like, Capitalism into Socialism) is automatic. It needs effort by the exploited class, their unity & struggle on a revolutionary ideology and party is utmost necessary. The revolution may turn into violent one, as the old rulers use all means to defeat the revolution, including violence.
Victory to the working class, peasants. 

Saturday, 26 August 2017

समाजवाद ही क्यूँ?

समाज को झंझोड़ने में सक्षम है, कल कमजोड था और दुसरे के सहारे जीवित था और बढ़ रहा था, आने वाले कल में विलुप्त हो जायेगा. हर घटना और व्यवस्था का शुरुआत होता है, एक खास नियम के तहत बढ़ता है और अंत होता है. शुरुआत भी किसी और घटना का अंत था, और जिसका अंत हो रहा है, वह एक नयी शुरुआत है किसी और व्यवस्था या दौर का!
प्रकृति के इसी नियम को द्वंद्वात्मक नियम कहते हैं. यहाँ यह भी समझने की बात है की शुरू और अंत के बीच भी इसी नियम का पालन होता है!
चार्वाक, अरस्तु, हेगेल भी इसे समझते थे, और इसे पूर्णयता विज्ञानिक बनाने का श्री जाता है मार्क्स को!
समाज में इस नियम को हर कोई देखता है पर सही निष्कर्ष केवल क्रन्तिकारी और वैज्ञानिक समझ वाले ही निकाल सकते हैं. धार्मिक दिमाग इसका इस्तेमाल जनता को बेवकूफ बनाने के लिए करते हैं. "बड़प्पन छोटों और गरीबों की मदद करने में है! पुन्य कमायें. क्या लाये हो और क्या लेकर जाओगे? हमें ही क्यूँ नहीं दे देते? वगैरह वगैरह!"
हम इस नियम को समझ कर समाज को अगले पड़ाव की ओर अग्रसर करने के लिए करते हैं. जिस पूंजीवाद की स्थापना 500 वर्षों पहले हुई थी सामंतवाद के गर्भ से, अब वह खुद गर्भवती है और उससे समाजवाद पैदा होगा. चूँकि भगवान, अल्लाह या गौड जैसा कोई हस्ती नहीं है, यह मजदूर वर्ग और किसान द्वारा ही होगा. पैदाईशी स्वाभाविक ढंग से ना हो तो सिजेरियन करना होगा, यानि बल प्रयोग करना होगा!
यही तो मार्क्सवाद है, जिसे भगत सिंह और साथियों ने समझा था और HSRA पार्टी के द्वारा अंग्रेजों को हराकर समाजवाद की स्थापना का सपना देखा था!
क्या हम अगले समाज के लिए एकताबद्ध हों या फिर इसी समाज के सड़ांध शव में सुधार की चेष्टा करें?

Saturday, 19 August 2017

Death Of Sanitation Workers In Delhi Exposes Govt's Hypocrisy & Failure

"While sewage cleaning has become mechanised in some parts of the country, the government figures suggest nearly 8,00,000 people still work as sewage cleaners."
It further says "...nearly 23,000 men and women die in India every year doing various kinds of sanitation work."

I was talking to one of my relative in Gorakhpur, who is a big fan of the present government and its reforms. I asked him if it was same reform, which started in 1990s by the Congress government? Like they wanted to reduce government jobs, start Aadhaar Card a mandatory need for all citizens (Same in Pak & Bangladesh with the help of US Co. China too was supposed to be part of it, but soon it threw out the parasites), implement GST, bring maximum FDI, cut budget on health, education, women's safety, etc.
All was on the instructions of IMF, WB and monopoly capitalists of US/UK and allies! Can you imagine, why they are so restless not only on liquidating laws favouring workers/peasants, but want the government to reduce budget on worker's welfare measures? So that government will tax their profit minimum! They also want their unpaid loans, taxes to be waived off! They want all the public property, created by our workers over decades, to be transferred to the big private concerns.
All for profit and it is an endless process. A year back 68 oligarchs had what half the Earthians had and now it is in hands of 8 (A report by Oxfam)! In 1920s US apologists claimed that they have made enough wealth and now the unemployment & poverty will be history. We know 31 million children in US do not have the basics, forget education!
Friends, recognise your real enemies. All the bourgeois parties are nothing but paid "managers'' of the oligarchs, who are running the country, constitution is for them, all the pillars of their bourgeois democracy serve them on fat salary and facilities!
Is Socialism possible? Is vision of Bhagat Singh and his party HSRA realisable? Understand the USSR of 1917-1956 before Khrushchev and cliches, Trots, Social Democrats did treachery to the first state of the working class. A socialist society was existing, which did progress under the leadership of the workers, which gave full freedom to its own people, women, free education and health services to all, unemployment became history. It developed science, technology, industry, agriculture, arts at par with other any developed nation and when needed it defeated the biggest campaign led by Nazis, single handedly, where US/UK forces entered only after Nazis started withdrawing, to share the 'yields' of the war!
So, friends, wake up, don't remain philistines, join the rational forces, the working class, peasants who can and will lead a revolution and establish a socialist society, which is historically inevitable.
Only in a Socialist society, the exploitation of workers, be Dalit, Tribe, Minority, Women will seize! Any form of exploitation of man by man will become impossible!
Long live revolution! Workers of the world unite!

Read the full story:
http://www.indiatimes.com/news/india/sewer-story-death-of-sanitation-workers-in-delhi-exposes-the-hypocrisy-failure-of-govt-328070.html

Ravish Kumar मीडिया असली परेशानियों को क्यों नहीं दिखाता || NDTV Ravish ...







Unemployment, poverty, miseries of the working class is rising. Life has become unbearable. Humiliation has become part of life.

Farmer's sucide has risen, despite change in "definition" of their sucide by BJP government to fudge data as in case of GDP. Women are unsafe. Children are dying due criminal government.

Who is happy? Or ask in broader case, for whom is democracy? For the working class, peasants whose living conditions have become hell or the capitalists who can plunder the people legally? Yes, legally after dozens of labour laws were abolished in name of reform and nation! Farmer's land is being snatched, especially in Central India, and if they resist, police, CRPF kills them, rapes their women!

No democracy, no secularism in capitalism is possible. Even the so called sovereign status of our country is fake as through FDI, MNCs are controlling us. IMF, WB are forcing us to follow their diktat, like reforms, GST, liquidating Labour Laws, Land Acquisition Act. The government acts like manager of these big capitalists, MNCs!

Is the way out an election? BJP government formed government in Goa, Manipur after losing election, in Bihar, where the voters kicked it out outrightly, In Tamilnadu, where it has no base!

Revolution to establish the dictatorship of the working class, peasants by replacing the dictatorship of the capitalists and imperialist powers. In other words, establishing the democracy of the working class by replacing the democracy of the big capitalists!

Is this possible without the lessons learnt by success of the Bolshevik Party and their heroic building of Socialism?

There is no alternate, friends! Long live revolution! Workers of the world unite to defeat Globalised Capitalism!

Friday, 11 August 2017

अस्पताल में मौत का तांडव : जिम्मेदार कौन?

अस्पताल में मौत का तांडव : जिम्मेदार कौन?

✍ डॉ. नवमीत

डॉ. नवमीत डॉक्टर फॉर सोसाइटी ( https://www.facebook.com/dfsind/ )  से जुड़े हैं
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11 अगस्त की खबर है कि गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दिए जाने की वजह से 40 बच्चों की मौत हो गई। ये सभी बच्चे  एनएनयू वार्ड और इंसेफेलाइटिस वार्ड में भर्ती थे। जनवरी से लेकर 11 अगस्त तक इंसेफेलाइटिस की वजह से इस मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान 151 मासूमों की मौत हो चुकी है जिनमे से 40 बच्चे 10 और 11 अगस्त को मर गए। गौरमतलब है कि यह मेडिकल कॉलेज यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पूर्व संसदीय क्षेत्र में आता है। आदित्यनाथ घटना से दो ही दिन पहले इस अस्पताल का दौरा भी करके गया था। खबरों के अनुसार अस्पताल पर ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का 69 लाख का बिल बकाया था। इस वजह से कंपनी ने गुरुवार यानि 10 अगस्त को अस्पताल के लिए ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दी थी। लिक्विड ऑक्सीजन बंद होने के बाद आज सारे ऑक्सीजन सिलेंडर भी खत्म हो गए। इंसेफेलाइटिस वार्ड में दो घंटे तक अम्बू बैग का सहारा लिया गया लेकिन बिना ऑक्सीजन के यह तरीका ज्यादा देर तक कारगर नहीं हो पाया और इस तरह से सरकार की उदासीनता, अस्पताल प्रशासन की लापरवाही और कंपनी की मुनाफाखोरी की गाज अस्पताल में भर्ती बच्चों पर गिरी। बीआरडी मेडिकल कॉलेज में दो वर्ष पूर्व लिक्विड ऑक्सीजन का प्लांट लगाया गया। इसके जरिए इंसेफेलाइटिस वार्ड समेत 300 मरीजों को पाइप के जरिए ऑक्सीजन दी जाती है। इसकी सप्लाई करने वाली कंपनी पुष्पा सेल्स है। कालेज पर कंपनी का 68 लाख 58 हजार 596 रुपये का बकाया था और बकाया रकम की अधिकतम तय राशि 10 लाख रुपये है। बकाया की रकम तय सीमा से अधिक होने के कारण देहरादून के आईनॉक्स कंपनी की एलएमओ गैस प्लांट ने गैस सप्लाई देने से इनकार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि बात की बात में 40 मासूम इस मुनाफाखोर व्यवस्था की भेंट चढ़ गए।

यह भी एकदम से नहीं हुआ, बल्कि गुरुवार की शाम से ही बच्चों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया था। ऑक्सीजन की सप्लाई रुकी पड़ी थी और एक-एक कर बच्चों की मौत हो रही थी। अस्पताल के डॉक्टरों ने पुष्पा सेल्स के अधिकारियों को फोन कर ऑक्सीजन भेजने की गुहार लगाई तो कंपनी ने पैसे मांगे। तब कॉलेज प्रशासन भी नींद से जागा और 22 लाख रुपये बकाया के भुगतान की कवायद शुरू की। पैसे आने के बाद बाद ही पुष्पा सेल्स ने लिक्विड ऑक्सीजन के टैंकर को भेजने का फैसला किया है। लेकिन अब तक तो बहुत देर हो चुकी थी और 40 बच्चे भी मर चुके थे। यह खबर आने तक कहा जा रहा था कि यह टैंकर शनिवार की शाम या रविवार तक ही अस्पताल में पहुंच पायेगा। मौत के ऊपर लापरवाही और लालच का यह खेल भी नया नहीं है, पिछले साल अप्रैल में भी इस कंपनी ने 50 लाख बकाया होने के बाद इसी तरह ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दी थी।

दूसरी तरफ सरकार और प्रशासन का रुख भी इस मामले में बेहद शर्मनाक रहा। हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार अस्पताल के डॉक्टरों ने प्रशासनिक अधिकारियों को संकट की जानकारी दी और मदद मांगी। मगर जिले के आला अधिकारी बेपरवाह रहे। वार्ड 100 बेड के प्रभारी डॉ. कफील खान के बार बार फोन करने के बाद भी किसी बड़े अधिकारी व गैस सप्लायर ने फोन नहीं उठाया तो डॉ. कफील ने अपने डॉक्टर दोस्तों से मदद मांगी और अपनी गाड़ी से ऑक्सीजन करीब एक दर्जन सिलेंडरों को ढुलवाया। उनकी कोशिशों के बाद एसएसबी व कुछ प्राइवेट अस्पतालों द्वारा कुछ मदद की गई। सशस्त्र सीमा बल के अस्पताल से बीआरडी को 10 जंबो सिलेंडर दिए गए। लेकिन अभी भी स्थिति भयावह थी और ज्यादा मौतें होने की सम्भावना बनी रही थी।

बीमारी का यह हमला आकस्मिक नहीं था। इंसेफेलाइटिस की वजह से हर साल हमारे देश में हजारों बच्चे मर जाते हैं। यह बीमारी हर इसी मौसम में अपना कहर ढाती है। 1978 से अब तक इंसेफेलाइटिस अकेले पूर्वांचल में 50 हजार से अधिक मासूमों को लील चुकी है। 2005 में इसने महामारी का रूप लिया था। तब अकेले बीआरडी मेडिकल कालेज में 1132 मौतें हो गई थीं। मई 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए अभियान शुरू किया था। मोदी की तारीफों के पुल बांधते हुए आदित्यनाथ ने घोषणा की थी कि मोदी के आशीर्वाद से पोलियो और फ़ाइलेरिया की तरह इंसेफेलाइटिस को भी खत्म कर दिया जायेगा। लेकिन हुआ ये कि जो बच्चे बच सकते थे उनकी एक तरह से हत्या कर दी गई। अब गोरखपुर के डीएम राजीव रौतेला ने घटना की जांच की बात कही है। जाहिर है जब तक जाँच होगी तब तक हमेशा की तरह इस मामले को भी फाइलों के नीचे दबाया जा चुका होगा।

और यह सिर्फ गोरखपुर या इस एक अस्पताल की बात नहीं है। पूरे ही देश में स्वास्थ्य सेवाओं का यही हाल है। जनता को हर तरह की स्वास्थ्य सेवा देने की जिम्मेदारी होती है सरकार की। लेकिन अव्वल तो सरकार यह करती नहीं है और कुछ सरकारी अस्पताल जो ठीक ठाक काम करते भी थे उनकी हालत भी अब बद से बदतर होती जा रही है। पिछले दो दशक में आर्थिक सुधारों और नवउदारवादी नीतियों के चलते यहाँ हर क्षेत्र की तरह जनस्वास्थ्य की हालत भी खस्ता हो चुकी है। सरकार लगातार इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढाती जा रही है। अब पूंजीपति तो कोई भी काम मुनाफे के लिए ही करता है तो साफ है कि स्वास्थ्य सेवाएँ महँगी तो होनी ही हैं। और महँगी होने के बाद भी जान नहीं बचती। परिणाम हमारे सामने है। किस तरह मुनाफे के लिए पुष्पा सेल्स नाम की इस कंपनी ने 40 बच्चों की जान ले ली है। लेकिन साथ में सरकार और प्रशासन भी बराबर जिम्मेदार है।

बहरहाल अच्छे दिनों, भारत निर्माण, इंडिया शाइनिंग के लोकलुभावने नारे देने वाली और लव जिहाद, गौहत्या जैसे साम्प्रदायिक मुद्दे उछालने वाली सरकारों को आम आदमी की सेहत का कोई ख्याल नहीं रहता है। पहली बात तो ऑक्सीजन या दवाओं या फिर किसी भी जरूरी सामान की उपलब्धता सरकार को ही सुनिश्चित करनी चाहिए और अगर नहीं करती है तो इस उपलब्धता को सुनिश्चित के लिए जरुरी बजट हर हाल में उपलब्ध होना चाहिए। साथ में यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि यह बजट सही समय पर सही जगह लग जाए। लेकिन इनमें से कोई भी चीज नहीं होती और इसी तरह से मरीज मौत का शिकार हो जाते हैं। बजट की बात करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार किसी भी देश को अपनी जीडीपी का कम से कम 5 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य क्षेत्र में लगाना चाहिए। भारत की सरकारों ने पिछले दो दशक के दौरान लगातार 1 प्रतिशत के आसपास ही लगाया है। 11वीं पंचवर्षीय योजना में 2 प्रतिशत का लक्ष्य रखा गया था और केवल 1.09 प्रतिशत ही लगाया गया। 12वीं योजना के पहले सरकार ने उच्च स्तरीय विशेषज्ञों का एक ग्रुप बनाया था जिसने इस योजना में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जीडीपी का 2.5 प्रतिशत निवेश करने की सिफारिश की थी लेकिन सरकार द्वारा लक्ष्य रखा सिर्फ 1.58 प्रतिशत। पिछले बजट में भी यह डेढ़ प्रतिशत के आसपास ही रहा है। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र द्वारा किया गया निवेश इस क्षेत्र में किये गए कुल निवेश का 75 प्रतिशत से भी ज्यादा है। पूरी दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं के अंतर्गत निजी क्षेत्र की होने वाली सबसे बड़ी भागीदारियों में एक नाम भारत का भी है। जाहिर है कि निजी क्षेत्र की ये कंपनियां लोगों के स्वास्थ्य की से खेलते हुए पैसे बना रही हैं। इनकी दिलचस्पी लोगों के स्वास्थ्य में नहीं बल्कि अपने मुनाफे में होती है और जब इनको लगता है कि मुनाफा कम होने लगा है या उसमें कोई अडचन आ गई है तो ये ऐसा ही करती हैं जैसे इन्होने गोरखपुर के इस अस्पताल में किया। और यह सब सरकार की शह पर होता है।

इसके अलावा देश के हर नागरिक हो स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिए। सही समय पर सही अस्पताल, डॉक्टर और इलाज मुहैया हो यह जिम्मेदारी भी सरकार की ही है। मानकों के अनुसार हमारे देश में हर 30000 की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, हर एक लाख की आबादी पर 30 बेड वाले एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और हर सब डिविजन पर एक 100 बेड वाला सामान्य अस्पताल होना चाहिए लेकिन यह भी सिर्फ कागजों पर है। और यह कागजों के मानक भी सालों पुराने हैं जिनमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। बदलाव करना तो दूर की बात है इन्हीं मानकों को सही ढंग से लागू नहीं किया जाता जबकि पिछले दो दशक में कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट और कॉर्पोरेट अस्पताल जरुर उग आये हैं जिनमें जाकर मरीज या तो बीमारी से मर जाता है या फिर इनके भारीभरकम खर्चे की वजह से। अब सरकार एक और शिगूफा लेकर आई है, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप। मतलब सरकार अब प्राइवेट कंपनियों के साथ सहकारिता करेगी और लोगों को अन्य सेवाओं के साथ स्वास्थ्य सेवाएँ भी उपलब्ध करवाएगी। यह शिगूफा और कुछ नहीं बल्कि पुष्पा सेल्स जैसी कंपनियों को मुनाफा देने की कवायद है ताकि ये पैसे बना सकें और समय आने पर इस मामले की तरह लोगों की जान से खेल सकें।

बहरहाल बात ये है कि इन बच्चों सहित इस देश में रोज होने वाली ऐसी मौतों, जिनको रोका जा सकता था, के लिए मुनाफे पर आधारित यह व्यवस्था जिम्मेदार है। साथ में जिम्मेदार है इस देश की सरकारें जो कहने को तो इस देश की हैं लेकिन काम वे करती हैं पूंजीपतियों के लिए। किस तरह से इस मानवद्रोही व्यवस्था को खत्म किया जाये यह आज के समय का सबसे बड़ा सवाल है और इसका जवाब हम सबको ही ढूँढना होगा ताकि इस तरह से मासूमों की बलि न चढ़ सके।

Friday, 28 July 2017

नितीश क्या जयचंद हैं?

जहाँ भाजपा के समर्थक नितीश के भाजपा के साथ सरकार बनाने को घर वापसी का नाम दे रहे हैं, वहीँ विरोधी उन्हें "जय चंद" का ख़िताब दे रहे हैं.सच्चाई क्या है?
नितीश कुमार एक बुर्जुआ राजनीतिज्ञ हैं, जैसे की लालू, मोदी, अमित शाह, राहुल गाँधी, केजरीवाल, आदि. इनका "वर्ग" चरित्र पहुंचानो दोस्त! अकेले देखने, इनके वर्गीय हित को छोड़कर, इनका विश्लेषण अधुरा होगा, एक भूल होगी और इनके बिछाये जाल में ही फंसे रहेंगे. देखा ही होगा कितनी आसानी से सारा का सारा दल दुसरे के साथ मिल जाता है सत्ता और धन के लिए और तुर्रा यह की देश के लिए, सिद्धांत के लिए किया गया है यह दल बदलाव.
यह पूंजीपतियों के लिए काम करते हैं. भूलकर भी ये लोग सर्वहारा वर्ग की सत्ता की बात नहीं करते. इन व्यक्ति विशेष को गाली देना बंद करो दोस्त, अपने वर्ग के साथ एक्ताबद्द हो.
सत्ता और धन कमाने की चाहत तो भरी है इनमे, पर ना भी हो तो क्या अंतर पड़ता है. ये लोग और इनकी पार्टी मजदुए वर्ग और किसान के हित के विरोध में काम करते हैं. पूंजीवाद को मजबूत करना या उसे सुधारने का मतलब ही है पूंजी के लिए अधिक मुनाफा दर यानि मजदूरों की मजदूरी में कटौती करना, बेरोजगारी बढ़ाना, महंगाई बढ़ाना, आर्थिक मंदी को नकारना, जो पूंजीवाद के गर्भ से पैदा होता है, नाकि भ्रष्टाचार और घटिया देख रेख के कारन!
हाँ, कोई खास व्यक्ति ज्यादा लोभी, काईयाँ हो सकता है, जो आजकल अधिकांश दिखते हैं. इसका भी कारन है, पूंजीवाद का भयानक दलदल में फंसना, फासीवाद का आना.
रास्ता पीछे जाना नहीं है, पर आगे जाना है, मजदुर वर्ग के नेत्रित्व में क्रांति, पूंजीवाद को ध्वस्त करना और समाजवाद की स्थापना! भगत सिंह ने रास्ता दिखाया है समाजवादी क्रांति का, HSRA के मैनिफेस्टो में, और भी लेखों में. क्यूँ भटक रहे हैं साथी? सुधार नहीं क्रांति का झंडा बुलंद करें. फासीवाद को हराकर पूंजीवाद नहीं, समाजवाद के लिए संघर्ष करें.

Tuesday, 4 July 2017

किसान शोषण, संघर्ष, रणनीति

मै कुछ दोस्तों से मिला, कुछ पुराने और कुछ नए से भी, जो किसानों के साथ मिलकर उनके हित के लिए लड़ रहे हैं. बहुत सारे संगठन भी हैं, जो इस लड़ाई में शामिल है. कुछ तो अपना ही स्वार्थ साध रहे हैं, कुछ वास्तव में ईमानदारी से भी लड़ रहे हैं.

रास्ता शांति का है पर लक्ष्य क्या है? कर्ज माफ़ी, वाजिद दाम पर बीज और खाद की पूर्ति, सिंचाई की समुचित व्यवस्था, और अंत में उत्पाद की खरीददारी उचित मूल्य पर. जमीन अधिग्रहण का विरोध भी शामिल है.
अधिकांश मांग वाजिब हैं. पर क्या यह सारे मांग पूंजीवाद में पुरे होंगे, जहाँ हर उत्पाद बाज़ार के लिए है, मुनाफे के लिए है? एक बात और. जब भी किसानों के संघर्ष विकराल रूप लेगा, कई मांग पुरे होंगे, सरकार किसी की भी हो, पूंजीपतियों के प्रति कितने भी निष्ठावान हो, मजबूरन मानेगी. हाँ, जब किसानों की एकता और संघर्ष ढीली पड़ जाएगी, सारी जीत, सुविधा, मांग वापस ले लिए जायेंगे एक एक कर!
आज यह नजर आ रहा है. जमीन अधिग्रहण कानून, जो कौंग्रेस ने ही प्रस्ताव रखी थी, आज कानून बन गया है, किसानों के भारी विरोध और प्रदर्शन के बावजूद.
दूसरी तरफ मजदुर वर्ग के हित के दर्जनों श्रम कानून ध्वस्त कर दिए गए. सैनिकों को वन रैंक वन पेंशन नहीं दिए गए. रोजगार ख़त्म किये जा रहे हैं. सार्वजनिक संपत्ति बड़े पूंजीपतियों को बेचे जा रहे हैं. प्राकृतिक सम्पदा देशी और विदेशी वित्त पूंजी के अधीन गिरवी रखे जा रहे हैं.
शिक्षा संस्थानों को पूंजी और धार्मिक उन्माद के तहत बर्बाद किया जा रहा हैं. शिक्षा का पूरी तरह व्यापारीकरण कर दिया गया है. भारी संख्या में सरकारी स्कूलों को बंद किया जा रहा है और प्राइवेट स्कूलों/कॉलेजों को बढ़ावा दिया जा रहा है.
मिडिया पर कुछ भी कहने की जरुरत नहीं है. स्वास्थ्य तो पूरी तरह पूंजी के खुनी पंजे में आ चूका है. न्याय व्यवस्था, पुलिस, प्रशाषण, सरकार, राजनितिक दल सभी के सभी इस बहती गंगा में हाथ ही नहीं अपना पैर भी धो रहे हैं.
कहने का तात्पर्य यह है की जन चेतना, एकता और संघर्ष के गिरावट पर पूंजी और उसके चाटुकार, चाकर वह सारे सुविधाएँ जो जनता ने संघर्ष कर दसियों वर्षों में अर्जित किये थे, एक झटके में वापस ले रही है, और दिख भी रहा है. उससे ज्यादा भी हड़प लेगी.
भारत ही नहीं, पुरे विश्व में इस तरह के घटनायें घट रही हैं. इतिहास में सैकड़ों घटनाएँ गवाह है! आज तो यह अमेरिका, युक्रेन, भारत, अरब देश, लैटिन अमेरिका, सारे अफ्रीका, यूरोप में दिख रहा है! विश्व के 8 इंसानों के पास उतना धन संकेंद्रित है, जितना की आधे पृथ्वीवासियों के पास.
तो क्या करें? पहले तो लक्ष्य बदलें. सुधार के लिए नहीं एक क्रन्तिकारी बदलाव के लिए लड़ें. सुधार प्रतिवर्ती है, और आज के जमाने में नाटक है, पूंजी के चमचों और चाकरों का. सुधार करना कोल्हू के बैल की तरह खटना है और अपने शोषित भाईओं को पूंजी के चक्रव्यूह में पिसने देना! अभी हाल में जबरदस्त किसान आन्दोलन हुए, 6 मारे भी गए, केवल क्षणिक राहत मिला. क्या इसीके लिए 6 किसानों ने बलिदान दी?
दुसरे एकता का आधार बड़ा करें. केवल किसान या केवल मद्जुर, दलित, आदिवासी, महिलाएं, अल्पसंख्यक, बाल मजदुर निदान पर एकता नहीं. बल्कि हर शोषितों की एकता. शोषकों के खिलाफ. दुश्मन का एक ही वर्ग और चरित्र है, जो मुनाफे के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है, चाहे आतंकवाद हो या फिर युद्द. बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, वेश्यावृति तो सामान्य है.
यदि लक्ष्य और एकता में यह मुलभुत आधार बदलना है तो, अगला प्रश्न विचारधारा का होगा. एक क्रन्तिकारी विचार, जो हमारे बीच है, भगत सिंह और उनके दल हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के समाजवादी विचारधारा.
यदि कुछ सच्चाई नजर आती है इन विचारों में तो आगे बढ़ें, अपने आपको एक नयी क्रन्तिकारी विचारधारा से जोड़ें, क्रन्तिकारी दल के साथ जुड़े और क्रांति के लिए आगे बढ़ें! किसानों, मजदूर वर्ग और बाकि सारे पीड़ित वर्गों को साथ जोड़ें. यह आबादी 90% से ज्यादा है. यह बात बुर्जुआ वर्ग और उसके सिद्धांतकार अच्छी तरह समझते हैं और उनकी पूरी कोशिश होती है इस संभावित खतरों को दूर रखने की. उन्हें यह भी मालूम है, जनता की एकता को कैसे तोड़े. धर्म, जाति, देश, व्यक्तिवाद, दुष्प्रचार से. वह भी दिख रहा है, अबतो फासीवाद ही हमारे बीच है. मजदूर बेरोजगार हो रहे हैं, किसान आत्महत्या कर रहे हैं, बेकसूर या तो जेल में डाले जा रहे हैं या आयोजित भीड़ द्वारा मारे जा रहे हैं!
दोस्तों, क्रांति कोई शौख या फिर मन की आकांक्षा नहीं बल्कि एक जरुरत है. यह एक ऐतिहासिक जरुरत है. पूंजीवाद तक़रीबन 500 वर्ष पहले, सामंतवाद को हटाकर स्थापित हुआ था. आज उसका ऐतिहासिक जरुरत ख़त्म हो चूका है. इसमे मानवता के लिए और कुछ भी प्रगतिशील नहीं बचा है, यह मरणासन्न है, प्रतिगामी है. इसका जीवन केवल युद्ध, आतंकवाद, उत्पादक शक्तियों के नाश पर बचा हुआ है. अभी तो केवल बुर्जुआ तानाशाही (या चाहें तो बुर्जुआ प्रजातंत्र भी कह सकते हैं), फासीवाद में तब्दील हो चुका है.
किसान, मजदूर और बाकि सारे अन्य शोषित वर्ग के सामने और कोई भी रास्ता नहीं है. समाजवाद ही एकमात्र रास्ता है. आओ, इस ऐतिहासिक क्रन्तिकारी संघर्ष में शामिल हो जाएँ!

इन्किलाब जिंदाबाद! भगत सिंह जिंदाबाद! मजदूर, किसान एकता जिंदाबाद!

Saturday, 3 June 2017

चाटुकारिता क्या हमारे खून में है? कैसे ख़त्म करें इस वायरस को? | Youth Ki Awaaz

चाटुकारिता क्या हमारे खून में है? कैसे ख़त्म करें इस वायरस को? | Youth Ki Awaaz: कबतक चमचे या उसके भी चमचे बने रहोगे? आत्म सम्मान जैसी कोई चीज है की नहीं तुम्हारे भेजे में? भारत में वीरों की कमी कभी नहीं रही. अन्याय के खिलाफ विद्रोह का



केवल सर्वहारा क्रांति से!

Friday, 2 June 2017

http://www.janchowk.com/pahlapanna/rohatak-aisin-company-%20laborer-dispute/347


रोहतक आइसिन कांड :कंपनी की मनमानी नहीं मानी तो मजदूरों को भेजा जेल



http://www.janchowk.com/pahlapanna/rohatak-aisin-company-%20laborer-dispute/347


“जापानी कंपनी के पक्ष में सरकार और सारा प्रशासन सक्रिय हैं और अपने ही देश के मज़दूरों के साथ कोई सहानुभूति नहीं। श्रमिक क़ानून और न्याय तो कहीं है भी नहीं। मज़दूर अपने ही देश में पराये हो गए हैं। उन्हें धरने की जगह पर टैन्ट लगाने की अनुमति भी नहीं दी गई थी, वे इतनी गर्मी और धूप में बिना छाया के बैठे थे। क्या मज़दूर इन्सान नहीं हैं  45-48 डिग्री तापमान में उन्हें धूप में बैठने को मजबूर करना , क्या यह इन्सानियत का व्यवहार है? मज़दूर क्या देश के नागरिक नहीं हैं? क्या मज़दूर का जायज़ बात पर बोलने का हक़ नहीं बनता? हिरासत में लिये गए मज़दूरों  में  30 महिला मज़दूर भी हैं।”



देशी विदेशी पूंजी के मालिक, उनकी सत्ता और सत्ता के खम्बे और मिडिया मिले हुए हैं, मजदुर वर्ग के शोषण के लिए, बेशी मूल्य बटोरने के लिए! मजदुर वर्ग एकताबढ क्यूँ नहीं हों? वर्गीय चेतना, एकता और संघर्ष के द्वारा ही सर्वहारा क्रांति संभव है, सर्वहारा सत्ता के लिए, शोषणविहीन समाज के लिए!

वर्गीय क्रांति ही वर्गविहीन समाज का आधार है!

Thursday, 25 May 2017

Dalitalism and Proletarian Revolution! | Youth Ki Awaaz

Dalitalism and Proletarian Revolution! | Youth Ki Awaaz: AAP was a product of NGO, which boasted to carry on the JLPB movement to its logical conclusion and gave a slogan “Political Revolution has begun”! Like an



"What is to be done?

Is there any alternate than raising the class consciousness of the exploited mass, training them, uniting them and leading them for a final attack on the exploiters, the capitalist class, dispossessing them and establish the proletarian hegemony?
The old & ‘bourgeois’ Left are obsolete and are almost in dustbin of history! The new revolutionary organisations are rising and as the revolution is lurking on horizon for the millions of millions of workers are rising!
Do you see how relevant is Bhagat Singh and his party HSRA today?"

Wednesday, 24 May 2017

Dalitism & Proletarian Revolution

AAP was a product of NGO, which boasted to carry on the JLPB movement to its logical conclusion and gave a slogan “Political Revolution has begun”! Like any other bourgeois party, it still claims to continue revolution. It is different matter that they also stated in their all rallies, statements, processions that the revolutionary era, flame comes once in decades, like in 1977 and the people must not miss the opportunity, failing which they have to wait another many decades! Now they are busy in bourgeois politics!
Why this failure? Because AAP never had an aim or a vision of any revolution, never wanted any Swaraj at national level, they never worked for the people’s democracy! Though they were not "revisionists" or probably not even corrupt like their other counterparts; Congress, BJP & their various allies in past or present!
They wanted to serve capitalism or maximum to “control” the big & small capitalists and that too evaporated after they expelled Yogendra Yadav, Prashant bhushan! The contrast & contradiction between Reformism and Revolution was very clearly visible!
Present Dalit movement is different than that of AAP, yet there is some similarities between the two. Both uphold capitalism and the pillars of bourgeois democracy, including present constitution, which Ambedkar wanted to burn it after 5 years of its creation, of which he was the head!!! Present constitution is, though a constitution of independent India, changed qualitatively by way of alternations, both by Congress & BJP governments. This constitution is amended to free the big capitalists, like Ambani, who are in fact the de facto rulers!
By upholding this constitution, what are we trying to achieve? Our own bourgeois rights to share money, power? This has only deepened the miseries of workers; Dalit workers, women workers, minority workers, tribal workers, child labours and all the workers, whether in fields & factories.
Dalitalism is part of bourgeois politics, like feminism. Without proletarian revolution, the emancipation of Dalits or any other exploited and oppressed sections of the society is not possible and same time it is also true that without participation of Dalits, revolution is not possible in India.
Class first of caste first?
This debate is eternal, especially among the ‘revolutionaries’, Dalit leaders, the Left ideologues. During Telangana movement, it was seen that the boundaries of caste, religion and region had crumbled. Ignorance and superstition was at the lowest level among the participants. A revolution has all-round effect on the people, on their thinking, idea, eating & living norms, hygiene, education, their comradeship, spiritualism. The question of which first, caste or class, is absurd during revolutionary time and is only valid for the reformists and bourgeois politicians or say, for the social democrats!
If aim is clear (a classless society, freedom of a man from all forms of exploitation by another man), the path must be clear! The slogan, “Workers of the World Unite”, is very meaningful and equally simple to understand and follow and must be implemented for a united struggle to dispossess the exploiters, ruling class!
A Communist or a Communist Party is very sensitive to the cause of all the oppressed and exploited sections of the society. Dalit question is a big issue for them as well as the progressive forces, as the attacks on them by RSS & its various other groups has increased many folds, including Tribes, Women and Minorities, in recent times!
Such attacks are being “used” by the middle and upper Class Dalits, including Congress, BJP & independents to make their own social bases and political mileage, which eventually turns in sharing power and money in bourgeois plunder! They have an opportunity to do so, as the massive loss of BSP in UP & UK election has bewildered the Dalits and LJP of Bihar is part of the exploiters & they are fishing in the troubled water!
What is to be done?
Is there any alternate than raising the class consciousness of the exploited mass, training them, uniting them and leading them for a final attack on the exploiters, the capitalist class, dispossessing them and establish the proletarian hegemony?
The old & ‘bourgeois’ Left are obsolete and are almost in dustbin of history! The new revolutionary organisations are rising and as the revolution is lurking on horizon for the millions of millions of workers are rising!
Do you see how relevant is Bhagat Singh and his party HSRA today?

Tuesday, 2 May 2017

Anti Fascism fight

Mukesh Tyagi

जनतंत्र और संविधान की क़सम खाने वाले ध्यान दें!
आज सुप्रीम कोर्ट में आधार के एक और मामले की सुनवाई थी (पुराना मामला तो 'न्यायाधीशों' ने जिंदा दफ़ना दिया है, इसलिये कुछ 'पागल' लोग एक नया मामला लाये थे) पिछले सप्ताह दो बड़े वकीलों (दातार और दीवान) ने आधार के ख़िलाफ़ बुर्जुआ जनतंत्र, स्वतंत्रता और मानव अधिकारों के सिद्धांतों के हिसाब से जबर्दस्त, प्रभावशाली तर्क दिए थे| 
आज सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल रोहतगी ने जवाब दिया| मुख्य बातें -
1. किसी व्यक्ति का अपने शरीर पर भी पूर्ण अधिकार नहीं है, सरकार हमारे अपने शरीर पर अधिकार पर भी रोक लगा सकती है|
2. रूसो (जी हाँ, सही पढ़ा, रूसो!) के सोशल कॉन्ट्रैक्ट की नई व्याख्या दी गई - समाज एक कम्पनी है जिसके हम मेंबर (मज़दूर?) हैं! राजसत्ता तो पूँजी मालिक अर्थात शेयरहोल्डर ही हुई फिर! समझिये - पूँजी मालिक की मर्जी ही अंतिम है, श्रमिक को तो मजदूरी मिल जाये वही बहुत है!
3. राजसत्ता को पूर्ण अधिकार है कि वह चाहे तो व्यक्ति का कुछ भी करे - चाहे तो उसकी जान ले ले (यही कहा गया, मेरा निकाला अर्थ नहीं हैं!)
4. अब तक हम आपको मूर्ख बना रहे थे आधार को स्वैच्छिक बताकर; आज बता देते हैं कि यह अनिवार्य है, बचने का कोई मौका नहीं दिया जायेगा|
5. संविधान के मूल अधिकारों वाले अनुच्छेद 19 (1) (g) का हवाला दिया गया था; सरकार की ओर से रोहतगी ने कहा कि इस अनुच्छेद का तो ज़िक्र भी मैंने बहुत दिन बाद सुना है, अब भी लोग इसकी बात करते हैं क्या!
रोज-रोज बड़ी-बड़ी वीरताभरी टिप्पणियाँ करने वाले न्यायाधीश लोग आज इस सरकारी साफ़गोई पर ज़्यादातर चुप ही रहे!
तो जनाब, आप दम भरते रहिये जनता के संविधानिक अधिकारों, स्वतंत्रताओं और परम्पराओं का, सत्ताधारी वर्ग अब इसे प्रहसन से ज़्यादा कोई अहमियत नहीं देता; वे अब इस नाटक का पटाक्षेप कर मेहनतकश लोगों पर नग्न पूँजीवादी शोषण और दमन का फ़ासीवादी चक्र चलाने के लिये तैयार हैं|

A very right analysis!
Fascism is in every field of governance & society. Only a blind, for whatever reasons, can not see it. For a political activist, a left ideologue or a fighter for the working class cannot ignore this reality!
The fight against this ugly, blood thirsty beast is no more possible in old ways. Example of a "Grand Alliance" may alter the face of this beast but the virus is in every 'pillars' of the bourgeois democracy, in social organisations, educational institutions, the parasitic criminal goons are here to stay & grow. The Left alliance with Congress is too old and stale, we saw a trailer in Bengal's election.
The truth or the ground reality is very clear. Aadhar, life term for the MUL workers & Sai Baba, killing of the minorities, Dalits, progressive writers, etc by these goons are few examples. Military is no more untouched, junior was elevated to become the Chief.
So, the solution of the present is only & only a proletarian revolution, whether in a single stage or in two is irrelevant at present, but this revolution must culminate in establishing socialism, burying capitalism, the mother of all evil & exploitation, forever.
Anti fascism fight must end by establishing socialism!

Saturday, 29 April 2017

फासीवाद का बढ़ता कदम और क्रन्तिकारियों की रणनीति

मै पहले ही बता दूँ की यह लेख किसी क्रांतिकारी दल का मैनिफेस्टो या कार्यक्रम नहीं है. यह एक सोच है, आधार है मार्क्सवादी भगत सिंह और ऐतिहासिक द्वंदवादात्मक पद्धति, और उसपर आधारित आजतक के आर्थिक, राजनितिक, सामाजिक अनुभव. इसमे और जोड़ने की जरुरत है ताकि, आज का विश्लेषण समग्रता में कर सकें, क्रांति को सही रास्ते पर ला सकें.
भारतीय इतिहास भिन्न है यूरोप के इतिहास से, फिर भी एक समानता है. यूरोप और अमेरिका में जहाँ दासप्रथा था, भारत में जातिवादी प्रथा एक कोढ़ के रूप में पनपा, बड़ा हुआ और सड़कर समाज को दूषित कर रहा है. दोनों ही उत्पादन के तरीकों से  सम्बन्ध रखते हैं और उसकी उपज हैं.
फिर पुरे विश्व में राजतन्त्र या सामंतवाद ने अपना कब्ज़ा किया. उत्पादन के साधन, मुख्य रूप से जमीन, पर स्वामित्व कायम किया और किसानों को उसपर काम करने का अवसर दिया लगान के बदले में! ध्यान रहे जमीन अभी भी सामाजिक था. भगवान या काल्पनिक शक्ति, जिसने ‘दुनिया और जीवन बनाया’, का महत्त्व बढ़ा और उसके आधार पर बने धर्म ने लाखों, करोड़ों इंसानों को मारा!
पूंजीवाद
फिर करीब 500 वर्षों पहले पूंजीवाद का आगमन हुआ और राजा/जमींदार-प्रजा/किसान का सम्बन्ध बदलकर पूंजीपति-मजदुर में तब्दील हो गया. उत्पादन क्षमता में अपार वृद्धि हुई और साथ ही साथ जहाँ नव निर्मित मजदुर वर्ग (जो पहले किसान थे, जमीन से जुड़े हुए थे, और अब सर्वहारा बन गए, जिनके पास अपने को जीवित रखने के लिए अपने श्रम को बेचने के आलावा और कोई श्रोत नहीं बचा) के शोषण में गुणात्मक वृद्धि हुआ, वही अकूत धन का निर्माण और उसका जमावड़ा कुछ के हाथों में हुआ. सैकड़ो और हजारों मजदुरों को एक साथ, एक शहर में रहने का मौका मिला, जाति, धर्म, रंग गौण हुआ और एक भाईचारा का जन्म हुआ, जो एक क्रांति का आधार बना!  
मुनाफे के होड़ ने एकाधिकार पूंजीवाद को जन्म दिया, यानि स्वतन्त्र बाज़ार ख़त्म हुआ और खुले प्रतियोगिता के जगह तोड़-फोड़, युद्ध, आतंकवाद ने स्थान लिया. यहाँ तक की सरकार भी स्वतन्त्र नहीं रही, चाहे वह विकसित देश हो या अविकसित. अविकसित देशों के ऊपर केवल देश के पूंजीपतियों का ही हाथ नहीं बल्कि विदेशी पुंजियों का भी हस्तक्षेप साफ़ साफ दिखता है. विरोध करने पर हर तरीके के साधन का इस्तेमाल किया गया, ताकि ‘प्रजातान्त्रिक’ तरीके से चुने गए सरकार को गिराया जा सके, बदले में एक ‘गुलाम’ सरकर लाया जा सके, जरुरत पड़ने पर सेना का भी इस्तेमाल किया गया!
भारत
1992 से कौंग्रेस की ने ‘सुधार’ के नाम पर श्रम कानून और जमीन अधिकरण कानून को लाने की भरपूर कोशिश की. वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ के आदेशों का पालन मजबूती से होने लगा! बढ़ते जीडीपी से खुश देशी और विदेशी बुर्जुआ वर्ग ने मनमोहन सिंह की भरपूर तारीफ की, मिडिया ने राहुल गाँधी के तारीफ में भरपूर दासता दिखाई. एफडीआई और अमेरिकी हस्तक्षेप का विरोधी दलों ने विरोध किया पर दिखावे के लिए, जो अब साफ़ है; भाजपा सारे कॉंग्रेसी आर्थिक निति को ही अपना ही नहीं रही, बल्कि उसे त्वरित कर रही है. धर्म और देश एक मुखौटा है मिहनतकाश जनता के भारी शोषण को छुपाने के लिए, उसके एकताबद्ध विरोध को हासिये पर करने के लिए. सामंतवाद ने जो इस्तेमाल धर्म का किया था, उसे ख़त्म करने के बजाय, पूंजीवाद ने उसका पुनरुत्पादन और बृहद रूप में किया. वाम ने भी विरोध किया, काफी ‘सभ्यता’ दिखाई और विरोध सडकों पर जुलुस के रूप तक आया पर वर्ग संघर्ष के रूप में नहीं, मजदुर वर्ग को सत्ता से जोड़ने के रूप में नहीं, जो तेलंगाना या नक्सलबाड़ी में दिखा था.
बीच में अटल बिहारी वाजपेयी के नेत्रित्व में एनडीए सरकार बनी. जिसने इस ‘सुधार’ को आगे ही नहीं बल्कि त्वरित किया! जनता ने इसका भरपूर विरोध किया और कौंग्रेस सरकार वापस आई. यहाँ विश्व आर्थिक संकट का भी आगमन हुआ, जो 2008 में अमेरिका से शुरू हुआ. इस मंदी ने आजतक पीछा नहीं छोड़ा और विश्व पूंजीवाद आर्थिक उछाल की उम्मीद लगाये बैठा है.
अमेरिका और यूरोप के बुर्जुआ आर्थिक ‘विशेषग्य’ मार्क्स का ‘दास कैपिटल’ पढ़ रहे हैं. इस पुस्तक के बिक्री में जबरदस्त उछाल आया है;. पर उनक दुर्भाग्य, दास कैपिटल पूंजीवाद के अन्दुरुनी अंतर्द्वंद की चर्चा बखूबी करता है, पर उससे निजात के लिए समाजवाद की स्थापना की बात करता है. यानि पूंजी के रूप में आमूल परिवर्तन. निजी पूंजी के जगह सामाजिक धन की वकालत. केवल वितरण ही नहीं बल्कि उत्पादन के साधन पर कुछ पूंजीपतियों के जगह पुरे समाज का नियंत्रण! पूंजीवाद के विरोध को ध्वस्त करने के लिए मार्क्स सर्वहारा तानाशाही की वकालत जरुरत के रूप में करते हैं, जो फ्रार्न्स के क्रांति से निष्कर्ष के रूप में निकला था (और अब तो और सख्ती की जरुरत होगी, जो शिक्षा सोविअत रूस में पूंजीवाद की प्नार्स्थापना से हुई है)!
2014 का चुनाव
2012 तक जनता अपना धैर्य खो चुकी थी. ऊपर से कौंग्रेस प्रशाषण का अपराध, भ्रष्टाचार और जनता के दुखों के प्रति असंवेदनशीलता भी काफी हद तक सामने आ चूका था. भारतीय और विदेशी पूंजी भी मनमोहन सिंह के नेत्रित्व से असंतुष्ट थे. दोनों का असर एक अन्दोहालन के रूप में हुआ. यह जन लोकपाल आन्दोलन के नाम से प्रसिद्द हुआ. यह आन्दोलन कुछ हद तक स्वस्फूर्त भी था, फिर भी इसमे पूंजी के दलाल, चिन्तक, मिडिया और पैसे लगे हुए थे. यह आन्दोलन अन्ना हजारे के नेत्रित्व में हुआ और अंतत कौंग्रेस सरकार को मोदी सरकार ने हटाया. मोदी सरकार को लाने में एक सुनियोजित देशी, विदेशी पूंजी और मिडिया का हाथ था. आप ने भी कुछ सफलता हासिल की, पर उसकी कोशिश पूंजीवाद में सुधार तक ही सिमित थी. प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव जो पूंजीपतियों पर सरकारी नियंत्रण के पक्ष में थे, बाहर के रास्ते दिखाए गए, एक महज गैर प्रजन्त्रिक तरीके से.
हाल के 5 राज्यों के चुनाव में आप ने गोवा और पंजाब में चुनाव लडे, जहाँ उसे मुह की खानी पड़ी. दिल्ली के एमसीडी चुनाव में भाजपा के पैसे, मिडिया और लगातार आप के खिलाफ दुष्प्रचार ने आप को बुरी तरह हराया. धर्म और देशवाद ने तर्क का सत्यानाश कर दिया है. आप ने बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा में अच्छा काम किया था, पर दिल्ली की जनता ने उसे नकार दिया. यहाँ यह भी कहना गलत नहीं होगा की 1977 के आन्दोलन का मुख्य नारा या मुद्दा था, जनप्रतिनिधि को 5 साल से पहले बुलाने का अधिकार. यह मुद्दा प्रखर ना होने के बावजूद 2012 में छाया रहा. अब विपक्षी दल तो उसका नाम भी नहीं ले रहे हैं, योगेन्द्र यादव के कहने के बावजूद आप खामोश है, और अपनी बुर्जुआ मौकापरस्ती और लालच को ही प्रकट कर रही है, भले ही वह कश्मीर के पीडीपी और भाजपा की मिली जुली सरकार से कम मौकापरस्ती हो.
2014 से 2017 तक की कहानी
जी हाँ. कहानी ही तो है! बढ़ते फासीवाद की. इसका जन्म अचानक नहीं हुआ है. 1925 में जन्मी आरएसएस ने अंग्रेजों की खिदमत की, 1942 के आन्दोलन में अंग्रेजों का साथ दिया, इसके प्रमुख सावरकर ने अंग्रेजों से माफ़ी मांगी और काला पानी की सजा को ख़त्म करवाया. वाजपेयी ने भी देश छोडो आन्दोलन से अलग रहने का लिखित वचन दिया और जेल में जाने से बचे. 1947 में तिरंगा झंडा को जलाया. हाल तक अपने कार्यालयों में तिरंगा नहीं फहराया. शुरूआती दौर से ही मालिकों और पूंजीपतियों की खिदमत करना इसके संविधान में था. दूसरी ओर दलितों, अल्पसंख्यकों, औरतों, आदिवासियों और मजदूरों के प्रति घृणा भी इसकी खून में ही था. यह घोर दक्षिण पंथी दल इटली के फासीवादी दल से ही प्रेरणा लेता रहा है!
मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही 34 श्रम कानून ख़त्म कर दिए और साथ ही साथ संविधान में संधोशाधन कर अम्बानी के एफआईआर को निरस्त्र कर दिया.
स्वतंत्रता के बाद कौंग्रेस ने, नेहरु, पटेल आदि के नेत्रित्व में भारत को पूंजीवाद के रास्ते पर लाया. अम्बेडकर के नेत्रित्व में बना संविधान भी इसकी पुष्टि करता है. शुरुआती दौर में भातीय पूंजीवादी इतने सशक्त नहीं थे की वह खुद अपने पैरों पर खड़ा हो सके. नतीजा था ‘मिक्स्ड इकोनोमी’, जो कहीं से भी समाजवाद के रास्ते पर नहीं था, भगत सिंह (या उनके हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिअशन से, जिनके कमांडर चंद्रशेखर आज़ाद थे) के मजदुर राज्य से कहीं से भी करीब नहीं था! जब पूंजी की ताकत एक खास सीमा से अधिक बढ़ गयी और उसे राज्य के मातहत रहने की जरुरत नहीं रही, (विदेशी पूंजी को भी मदद लेने की जरुरत पड़ी ताकि देशी श्रोतों का भरपूर शोषण किया जा सके), तो शुरू हुआ ‘सुधार’ का दौर, जो आवश्यक रूप से पूंजी के मोटा होने के लिए किया जाता है, चाहे वह अमेरिका में हो या हमारे यहाँ या फिर, ग्रीस, फ़्रांस, चीन या रूस में.
फासीवाद हर जगह दिख रहा है, चाहे राज्य या इसके विभिन्न अंग में हो या समाज में. गौ रक्षक, हिन्दू सेना, बजरंग दल, आरएसएस आदि इसके अंग हैं, जिसे आज की सत्ता पैसे, पुलिस, अर्ध सेना, प्रशाषण आदि का संरक्षण है. मारुती उद्योग के मजदूरों और अपन्ग साईं बाबा को आजीवन कारावास भी बढती फासीवाद का ही एक उदहारण है. गाँव, कस्बों तक में यह दिख रहा है. अल्पसंख्यकों, दलितों को देखें. एक भय व्याप्त है. बेरोजगार की कमी, छिनते जमीन, सिकुड़ते जंगल जहां हजारों वर्षों से आदिवासी रह रहे थे, घटती क्रय शक्ति और ऊपर से फासीवाद के टूकडे पर पलने वालों का आक्रमण! शहर या गाँव में, जो उची जाति से हैं, मध्य वर्ग के हैं, उनके ऊपर यह भय अभी नहीं दिख रहा है, पर बकरे की अम्मा कबतक खैर मनाएगी? मझले और छोटे वर्गीय व्यापारियों को देखें. उनका भी सर्वहाराकरण हो रहा है. आखिर 7% से अधिक जीडीपी कहाँ जा रहा है?
इस बीच वित्त पूंजी का आकार बढ़ रहा है. सेंसेक्स अपना पुराना रिकॉर्ड तोड़ रहा है. पर क्या मजदुर वर्ग बढ़ रहा है? समाजवाद के खिलाफ कुँए के मेढक तर्क देते हैं की मध्यम वर्ग बड़ा हो रहा है, सर्वहारा क्रांति अब संभव नहीं है. चीन भी उदहारण है इनका, इस तर्क के समर्थन में. 2008 याद है ना? ज्यादा बड़ा आर्थिक गिरावट आहट दे रहा है. एक उदहारण देना आवश्यक है. तकरीबन 3 साल पहले 1% पूंजीपतियों, वित्तीय संस्थानों के पास भारत के उतने धन थे जो 48% भारतीय के पास थे, अब उसी 1% के पास उतना है, जो 53% के पास हैं! धन का संकेन्द्रीयकरन बढ़ रहा है. इस आंकड़े को विश्व स्तर पर भी देखा जा सकता है. 1 साल पहले करीब 68 लोगों के पास उतना था जितना आधे पृथ्वीवासी के पास, जो अब 8 लोगों के पास है. माध्यम वर्ग भले ही बढ़ा हो, पर उसका सर्वहाराकारन लगातार हो रहा है! यह एक प्रक्रिया है, ध्रुव सत्य नहीं.
दिखता है फासीवाद का असली रूप. अमेरिका में ट्रंप का आना, फ़्रांस और यूरोप, युक्रेन में दक्षिणपंथीयों का काफी तेजी से बढ़ना, बढ़ते युद्द और 3सरी विश्व युद्ध की संभावना भी इसी का भयानक रूप है. आतंकवाद का ऐसा भयानक रूप पहले कभी नहीं दिखा. स्टीफेन हौकिन (अपन्ग, भौतिकशस्त्र के महानतम वैज्ञानिक) ने कहा है की मानवता को मशीनों से खतरा नहीं है बल्कि पूंजीवाद से है.
क्रन्तिकारी क्या करें?
जीहाँ, यह प्रश्न स्वाभाविक है. यहाँ यह सवाल प्रगतिशील ताकतों, युवकों और विद्यार्थियों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है! मजदुर वर्ग, किसानों के लिए अति जरुरी है.
आज की स्थिति का एक सही विश्लेषण, एक ऐतिहासिक सन्दर्भ में जरुरी है. बदलते हालात में विश्लेषण भी बदलेगा, क्रांति का रास्ता भी बदलेगा, कौन सा वर्ग किस वर्ग के साथ सम्बन्ध बनाएगा, यही विश्लेषण तय करेगा. एक सही वैज्ञानिक और क्रांतिकारी राजनितिक रास्ता तय होगा, जिसपर मद्जुर वर्ग की अगुवाइ में क्रांति सफल हो सकता है.
आज जरुरत है फासीवाद के विरुद्ध सर्वहारा वर्ग को प्रशिक्षित करना, उन्हें गोलबंद करना, हर फासीवादी चाल और कार्य का विरोध करना, वर्ग संघर्ष को तीव्र करना, राज्य सत्ता को हासिल करना, समाजवादी समाज स्थापित करना. यह स्पष्ट है, जो भी हमारे साथ आयें इस आन्दोलन में उन्हें भी हमारे लक्ष्य से रूबरू करवाएं. ध्यान रखें, कई धर्मनिरपेक्ष बुर्जुआ दल भी हमारे साथ आ सकते हैं पर उनका लक्ष्य पूंजीवादी समाज ही है, पर अब हम वापस फासीवाद का आधार पूंजीवाद हरगिज नहीं लाना चाहते, बल्कि इस दानव को, जो मेहनतकाश जनता के खून और पसीने पर फलता फूलता है, हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म करना चाहते हैं!

मजदुर दिवस पर सभी क्रांतिकारियों, मद्जुरों, किसानों को क्रन्तिकारी अभिनन्दन!