Sunday, 11 December 2016

Dec 11 राजनीति का ‘भक्ति काल’

"ममता बनर्जी, मायावती, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, लालूप्रसाद यादव, चन्द्रबाबू नायडू, उमर अब्दुल्ला, अरविन्द केजरीवाल को ज़रा एक मिनट के लिए दृश्य से हटा दें और फिर देखें कि इनकी पार्टियों की तसवीर कैसी दिखती है? ये नेता न हों तो ये पार्टियाँ किस बूते आगे बढ़ेंगी, चुनाव लड़ और जीत सकने लायक़ बचेंगी. इन नेताओं को छोड़ दें तो न इन पार्टियों के पास नेता दिखते हैं, न मुद्दे और न पार्टी के टिके रहने का कोई आधार."

http://raagdesh.com/cult-politics-in-india/

सामयिक ज्वलंत मुद्दा! वैसे भक्ति काल क्या हिटलर के समय नहीं था? लेखक ने अच्छा प्रश्न उठाया है, ..." ये नेता न हों तो ये पार्टियाँ किस बूते आगे बढ़ेंगी, चुनाव लड़ और जीत सकने लायक़ बचेंगी." बल्कि प्रश्न ज्यादा असरदार होगा यदि यह पूछे कि यदि ये चहरे न हो तो पूंजीवाद चलेगा की नहीं? पूंजीवाद के पास और भी कई हथियार हैं, मजदुर वर्ग को बरगलाने के लिए, मसलन, धर्म, देश और जाति, आदि! ये सारे दल चलेंगे, चुनाव भी जीतेंगे, क्युकी किसी को हारना भी तो है, और दुसरे चेहरे आयेंगे! कमी नहीं है 'टैलेंटेड' चाकरों, दलालों की जो पूरी निष्ठां से पूंजीपतियों की सेवा करने के लिए! बदले में इन्हें आलिशान बंगला, मुफ्त खाना, सूट, गाड़ी, हवाई यात्रा यानि 7 सितारा सुविधा, जेड सुरक्षा! ऊपर से भारी भरकम वेतन, सत्ता, शान, प्रचार, और खुद के लिए भी निचले स्तर के चमचे! चाहे तो भारी मात्र में देशी और विदेशी धन, देशी और विदेशी बैंक में! व्यक्तिवाद का विरोध करें! यह सामंती कुरीति है, जिसे पूंजीवाद ने बचाया, उसका ज्यादा बृहद रूप में पुनुरुत्पादन किया! इसका अंत समाजवाद में ही संभव है, जहाँ बेरोजगारी इतिहास होगा, हर व्यक्ति महत्वपूर्ण होगा और हर इंसान को अपना व्यक्तित्व को बुलुन्दी पर ले जाने का अवसर मिलेगा!

Friday, 9 December 2016

क्या हम एक मुर्दा समाज में रह रहें हैं जिसे सब कुछ सहन करने की आदत पड़ चुकी है?

असहमत! समाज जीवित है! हर रोज किसी न किसी कोने में विरोध का आवाज बुलुंद हो रहा है! उनकी रैली तो देखो, जो महीने या फिर दो महीने पर होती है, किसी राज्य या देश स्तर पर भी, लाखों मजदुर और किसान जमा हो जाते है! और यह लोग भाजपा या कोंग्रेस की भीड़ से अलग हैं, पैसे के लिए नहीं आते, बदलाव का हिस्सा बनाने के लिए आते है!
हाँ, दो सवाल हैं? समाज कहाँ ढूंड रहे हो? मध्यम वर्गीय जनता के बीच या फिर बड़े महल में रहने वाले पूंजीपति या उनके खिदमतगार? देखो समाज को मजदुर वर्ग और किसानों के बीच! मुझे मालूम है आप भी उन्हें ही ढूंड रहे हैं!
दूसरा, हमारे 'समाज' का नेत्रित्व किसके हाथ में है? दुर्भाग्य की नेत्रित्व 'वाम' के हाथ में होने के बावजूद पूंजी के लिए ही काम कर रहा है!
मजदुर वर्ग दुनिया में अबतक सबसे विकसित वर्ग है, क्रांति के लिए सबसे उपयुक्त वर्ग, वैसे कोई दूसरा कर भी नहीं सकता! जरुरत है, उसे जागरूक करने की, शिक्षित करने की, एकताबद्ध करने की! क्रन्तिकारी उफान आने पर सही नेत्रित्व क्रांति को सही मुहीम ओअर पहूँचाने में सफल होगा!
दुनिया में मजदुर एक हो!

Wednesday, 30 November 2016

"गाँव के गरीबों से": लेनिन- एक महत्वपूर्ण अंश

लेनिन के प्रसिद्ध् लेख ' गाँव के गरीबों से ' , का नीचे उद्धृत अंश पूंजीवाद के सार , कृषि में पूंजीवाद एवं मज़दूरों के कार्य-भार को बड़े सजीव ,सरल एवं सुबोध ढंग से पाठकों के समक्ष रखता है ।संक्षिप्त , सटीक और अद्भुत यह अंश अपने आप में एक सम्पूर्ण सम्बोधन है , जिसमें, हमारे यहाँ आज भी उठ रहे कई सवालों के स्पष्ट जवाब मिलते हैं :
" अक्सर लोगों को यह कहते सुना जाता है कि जमींदार या व्यापारी लोगों को ' काम देते हैं ' या वे गरीबों को रोज़गार देते हैं ।मिसाल के लिए कहा जाता है कि पडोसी कारख़ाना या पड़ोस का कोई फ़ार्म स्थानीय किसानों की 'परवरिश करता है ' । लेकिन असल में मज़दूर अपनी मेहनत से ही अपनी परवरिश करते हैं और उन सबको खिलाते हैं , जो खुद काम नहीं करते । लेकिन जमींदार के खेत में , कारख़ाने या रेलवे में काम करने की इजाज़त पाने के लिए मज़दूर को, जो कुछ वह पैदा करता है , सबका सब मुफ़्त में मालिक को सुपुर्द कर देना पड़ता है और उसे केवल नाममात्र की मज़ूरी मिलती है ।इस तरह न ज़मींदार और न व्यापारी मज़दूरों को काम देते हैं , बल्कि मज़दूर अपने श्रम के फल का अधिकतर हिस्सा मुफ़्त में देकर सबके भरण-पोषण का भार उठाते हैं ।
आगे चलिए । सभी आधुनिक देशों में जनता की गरीबी इसलिए पैदा होती है कि मज़दूरों के श्रम से जो तरह-तरह की चीजें पैदा की जाती हैं ,वे सब बेचने के लिए , मंडी के लिए होती हैं ।कारखानेदार और मिस्त्री-कारीगर , ज़मींदार और धनी किसान जो कुछ भी पैदा करवाते हैं , जो पशुपालन करवाते हैं या जिस अनाज की बोआई-कटाई करवाते हैं , वह सब मंडी में बेचने के लिए , बेचकर रुपया प्राप्त करने के लिए होता है ।अब रुपया ही हर जगह राज करनेवाली ताक़त बन गया है ।मनुष्य की मेहनत से जो भी माल पैदा होता है , सभी को रुपया से बदला जाता है । रुपए से आप जो भी चाहे खरीद सकते हैं । रुपया आदमी को भी खरीद सकता है, अर्थात जिस आदमी के पास कुछ नहीं है , रुपया उसे रूपएवाले आदमी के यहाँ काम करने को मज़बूर कर सकता है ।पुराने समय में, भूदास-प्रथा के ज़माने में , भूमि की प्रधानता थी ।जिसके पास भूमि थी, वह ताक़त और राज-काज , दोनों का मालिक था । अब रुपए की , पूंजी की प्रधानता हो गई है ।रुपए से जितनी चाहो ज़मीन खरीदी जा सकती है ।रुपया ना हो तो ज़मीन भी किसी काम की नहीं रहेगी , क्योंकि हल अथवा अन्य औज़ार , घोड़े-बैल खरीदने के लिए रुपयों की ज़रूरत पड़ती है ; कपडे-लत्ते और शहर के बने दूसरे आवश्यक सामान खरीदने के लिए ,यहाँ तक कि टैक्स ( लगान आदि-मेरे शब्द )देने के लिए भी रुपयों की ज़रूरत पड़ती है ।रुपया लेने के लिए लगभग सभी ज़मींदारों ने बैंक के पास ज़मीन रेहन रखी ।रुपया पाने के लिए सरकार धनी आदमियों से और सारी दुनिया के बैंक-मालिकों से क़र्ज़ लेती है और हर वर्ष इन कर्ज़ों पर करोड़ों रुपए सूद देती है ।
रुपए के वास्ते आज सभी लोगों के बीच भयानक आपसी संघर्ष चल रहा है ।हर आदमी कोशिश करता है कि सस्ता ख़रीदे और मंहगा बेचे ।हर आदमी होड़ में दूसरे से आगे निकल जाना चाहता है ।अपने सौदे को जितना हो सके ,उतना ज्यादा बेचना और लाभवाले बाजार या लाभवाले सौदे को दूसरे से छिपाकर रखना चाहता है ।रुपए के लिए सर्वत्र होनेवाली इस हाथापाई में छोटे लोग ,छोटे दस्तकार या छोटे किसान ही सबसे ज्यादा घाटा में रहते हैं : होड़ में वे बड़े व्यापारियों या धनी किसानों से सदा पीछे रह जाते हैं ।छोटे आदमी के पास कभी कुछ बचा नहीं होता । वह आज की कमाई को आज ही खाकर जीता है ।पहला ही संकट , पहली ही दुर्घटना उसे अपनी आखिरी चीज़ तक को गिरवी रखने के लिए या अपने पशु को मिट्टी के मोल बेच देने के लिए लाचार कर देती है ।किसी कुलक या साहूकार के हाथ में एक बार पड़ जाने के बाद वह शायद ही अपने को उनके चंगुल से निकाल पाए ।बहुधा उसका सत्यानाश हो जाता है ।हर साल हज़ारों-लाखों छोटे किसान और दस्तकार अपने झोंपड़ों को छोड़कर , अपनी बाँट की ज़मीन को मुफ़्त में ग्राम-समुदाय के हाथ में सौंप कर ( उस समय रूस में ग्राम-समुदाय की व्यवस्था थी और छोटे किसानों पर इस समुदाय एवम् पदाधिकारियों का नियंत्रण था , छोटे किसान ज़मीन बेचने को पूर्णतः स्वतंत्र नहीं थे - मेरे शब्द ) उज़रती मज़दूर , खेत-बनिहार, बेहुनर मज़दूर ,सर्वहारा बन जाते हैं ।लेकिन धन के लिए जो यह संघर्ष होता है , उसमे धनी का धन बढ़ता जाता है ।वे करोड़ों रूबल बैंक में जमा करते जाते हैं ।अपने धन के अलावा बैंक में दूसरे लोगों द्वारा जमा किए गए धन से भी वे मुनाफ़ा कमाते हैं ।छोटा आदमी दसियों या सैकड़ों रूबल पर , जिन्हें वह बैंक या बचत बैंक में जमा करता है ,प्रति रूबल तीन या चार कोपेक् सालाना सूद पाएगा ।धनी आदमी इन दसियों रूबल से करोड़ों बनाएगा और करोड़ों से अपना लेन-देन बढ़ाएगा तथा एक-एक रूबल पर दस-बीस कोपेक कमाएगा ।
इसीलिए सामाजिक-जनवादी मज़दूर कहते हैं कि जनता की गरीबी को दूर करने का एक ही रास्ता है- मौजूदा व्यवस्था को नीचे से ऊपर तक सारे देश में बदलकर उसके स्थान पर समाजवादी व्यवस्था कायम करना ।दूसरे शब्दों में बड़े जमींदारों से उनके फार्म , कारखानेदारों से उनकी मिलें और कारख़ाने और बैंकपतियों से उनकी पूंजी छीन ली जाएँ, उनकी निजी संपत्ति को ख़त्म कर दिया जाए और उसे देश भर की समस्त श्रमजीवी जनता के हाथों में सौंप दिया जाए ।ऐसा हो जाने पर धनी लोग , जो दूसरों के श्रम पर जीते हैं, मज़दूरों के श्रम का उपयोग नहीं कर पाएँगे , बल्कि उसका उपयोग स्वयं मज़दूर तथा उनके चुने हुए प्रतिनिधि करेंगे ।
ऐसा होने पर साझे श्रम की उपज तथा मशीनों और सभी सुधारों से प्राप्त होने वाले मुनाफ़े तमाम श्रमजीवियों , सभी मज़दूरों के हाथों में आएँगे ।धन और भी जल्दी बढ़ना शुरू होगा क्योंकि जब मज़दूर पूंजीपतियों के लिए नहीं बल्कि अपने लिए काम करेंगे, तो वे काम को और अच्छे ढंग से करेंगे ।काम के घंटे कम होंगे ।मज़दूरों का खाना , कपड़ा और रहन-सहन बेहतर होगा ।उनकी गुजर-बसर का ढंग बिलकुल बदल जाएगा ।
लेकिन सारे देश के मौजूदा निज़ाम को बदल देना आसान काम नहीं है ।इसके लिए बहुत ज़्यादा काम करना होगा , दीर्घ काल तक दृढ़ता से संघर्ष करना होगा । तमाम धनी , सभी संपत्तिवान, सारे बुर्जुआ अपनी सारी ताक़त लगाकर अपनी धन-संपत्ति की रक्षा करेंगे ।सरकारी अफसर और फ़ौज सारे धनी वर्ग की रक्षा के लिए खड़ी होगी क्योंकि सरकार खुद धनी वर्ग के हाथ में है ।मज़दूरों को पराई मेहनत पर जीनेवालों से लड़ने के लिए आपस में मिलकर एक होना चाहिए ; उनको खुद एक होना चाहिए और सभी सम्पत्तिहीनों को एक ही मज़दूर वर्ग , एक ही सर्वहारा वर्ग के भीतर एकबद्ध करना चाहिए ।मज़दूर वर्ग के लिए यह लड़ाई कोई आसान काम नहीं होगी , लेकिन अंत में मज़दूरों की विजय होकर रहेगी , क्योंकि बुर्जुआ वर्ग-- वे लोग जो पराई मेहनत पर जीते हैं-- सारी जनता में अल्पसंख्या हैं , जबकि मज़दूर वर्ग गिनती में सबसे ज्यादा है ।सम्पत्तिवानों के ख़िलाफ़ मज़दूरों के खड़े होने का अर्थ है , हज़ारों के ख़िलाफ़ करोड़ों का खड़ा होना ।"
( व्ला . इ . लेनिन -- ' गाँव के गरीबों से ' )

Monday, 28 November 2016

पूंजीवादी जुमला या समाजवाद?

सरकार के हर जुमले पर मध्यम वर्गीय मुर्ख ताली बजा रहे हैं, जैसे उनकी जेब में कुछ आने वाला हो! पता नहीं कुँए के मेढकों को कि उनका खुद का जेब खाली हो रहा है!
दुर्भाग्य मजदुर वर्ग का की उनके हित की बात करने वाले वामपंथी अवर्गीय लड़ाई लड़ रहे हैं, फासीवाद के विरुद्ध, बिलकुल वैसे ही जैसे की कोंग्रेस या आप लड़ रहे है, या जैसे भाजपा पहले लड़ता था!
मजदुर वर्ग की लड़ाई केवल आर्थिक हो ही नहीं सकता, इसे राजनितिक होना पड़ेगा, उसे अपनी सत्ता बनाना होगा! अभी के शोसकों को और उनके राज्य को ध्वस्त करना होगा!
एक समाज जो जुमलों, धर्म, जाति, व्यक्तिवाद पर नहीं, बल्कि समाज के हर सदस्य के लिए हो, जहाँ कोई शासक या शोषित नहीं हो! वर्ग विहीन समाज, जो संभव है और होगा!

Monday, 24 October 2016

राम राज्य कभी नही आना चाहिए: ओशो


राम के समय को तुम रामराज्य कहते हो। हालात आज से भी बुरे थे। कभी भूल कर रामराज्य फिर मत ले आना! एक बार जो भूल हो गई, हो गई। अब दुबारा मत करना।
राम के राज्य में आदमी बाजारों में गुलाम की तरह बिकते थे। कम से कम आज आदमी बाजार में गुलामों की तरह तो नहीं बिकता! और जब आदमी गुलामों की तरह बिकते रहे होंगे, तो दरिद्रता निश्चित रही होगी, नहीं तो कोई बिकेगा कैसे ? किसलिए बिकेगा ? दीन और दरिद्र ही बिकते होंगे, कोई अमीर तो बाजारों में बिकने न जाएंगे। कोई टाटा, बिड़ला, डालमिया तो बाजारों में बिकेंगे नहीं।
स्त्रियां बाजारों में बिकती थीं! वे स्त्रियां गरीबों की स्त्रियां ही होंगी। उनकी ही बेटियां होंगी। कोई सीता तो बाजार में नहीं बिकती थी। उसका तो स्वयंवर होता था। तो किनकी बच्चियां बिकती थीं बाजारों में ? और हालात निश्चित ही भयंकर रहे होंगे। क्योंकि बाजारों में ये बिकती स्त्रियां और लोग--आदमी और औरतें दोनों, विशेषकर स्त्रियां--राजा तो खरीदते ही खरीदते थे, धनपति तो खरीदते ही खरीदते थे, जिनको तुम ऋषि-मुनि कहते हो, वे भी खरीदते थे! गजब की दुनिया थी! ऋषि-मुनि भी बाजारों में बिकती हुई स्त्रियों को खरीदते थे!
अब तो हम भूल ही गए वधु शब्द का असली अर्थ। अब तो हम शादी होती है नई-नई, तो वर-वधु को आशीर्वाद देने जाते हैं। हमको पता ही नहीं कि हम किसको आशीर्वाद दे रहे हैं! राम के समय में, और राम के पहले भी--वधु का अर्थ होता था, खरीदी गई स्त्री! जिसके साथ तुम्हें पत्नी जैसा व्यवहार करने का हक है, लेकिन उसके बच्चों को तुम्हारी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होगा! पत्नी और वधु में यही फर्क था। सभी पत्नियां वधु नहीं थीं, और सभी वधुएं पत्नियां नहीं थीं। *वधु नंबर दो की पत्नी थी।* जैसे नंबर दो की बही होती है न, जिसमें चोरी-चपाटी का सब लिखते रहते हैं! ऐसी नंबर दो की पत्नी थी वधु।
*ऋषि-मुनि भी वधुएं रखते थे!* और तुमको यही भ्रांति है कि ऋषि-मुनि गजब के लोग थे। कुछ खास गजब के लोग नहीं थे। वैसे ऋषि-मुनि अभी भी तुम्हें मिल जाएंगे।
एक मां अपने छोटे से बच्चे को कह रही थी कि बेटा, तू नौ-नौ बजे उठता है! अरे, ऋषि-मुनि की संतान हो; ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए! ऋषि-मुनि हमेशा ब्रह्ममुहूर्त में उठते थे!
उस बेटे ने कहा कि नहीं मां; ऋषि तो कभी आठ बजे के पहले नहीं उठते। मुझे पता है। और मुनि भी कभी नौ बजे के पहले नहीं उठते।
मां ने कहा, तू यह कहां की बातें कर रहा है ? उसने कहा, मुझे मालूम है। ऋषि कपूर आठ बजे उठता है और दादा मुनि अशोक कुमार नौ बजे उठते हैं!
इन ऋषि-मुनियों में और तुम्हारे पुराने ऋषि-मुनियों में बहुत फर्क मत पाना तुम। कम से कम इनकी वधुएं तो नहीं हैं! कम से कम ये बाजार से स्त्रियां तो नहीं खरीद ले आते! इतना बुरा आदमी तो आज पाना मुश्किल है जो बाजार से स्त्री खरीद कर लाए। आज यह बात ही अमानवीय मालूम होगी! मगर यह जारी थी!
*रामराज्य में शूद्र को हक नहीं था वेद पढ़ने का! यह तो कल्पना के बाहर की बात थी, कि डाक्टर अंबेदकर जैसा अतिशूद्र और राम के समय में भारत के विधान का रचयिता हो सकता था!* असंभव !! खुद राम ने एक शूद्र के कानों में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया था--गरम सीसा, उबलता हुआ सीसा! क्योंकि उसने चोरी से, कहीं वेद के मंत्र पढ़े जा रहे थे, वे छिप कर सुन लिए थे। यह उसका पाप था; यह उसका अपराध था। और *राम तुम्हारे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं! राम को तुम अवतार कहते हो! और महात्मा गांधी रामराज्य को फिर से लाना चाहते थे।* क्या करना है? शूद्रों के कानों में फिर से सीसा पिघलवा कर भरवाना है ? उसके कान तो फूट ही गए होंगे। शायद मस्तिष्क भी विकृत हो गया होगा। उस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना! शायद आंखें भी खराब हो गई होंगी। क्योंकि ये सब जुड़े हैं; कान, आंख, नाक, मस्तिष्क, सब जुड़े हैं। और दोनों कानों में अगर सीसा उबलता हुआ...!
तुम्हारा खून क्या खाक उबल रहा है निर्मल घोष! उबलते हुए शीशे की जरा सोचो! उबलता हुआ सीसा जब कानों में भर दिया गया होगा, तो चला गया होगा पर्दों को तोड़ कर, भीतर मांस-मज्जा तक को प्रवेश कर गया होगा; मस्तिष्क के स्नायुओं तक को जला गया होगा। फिर इस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना है! धर्म का कार्य पूर्ण हो गया। *ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दिया कि राम ने धर्म की रक्षा की। यह धर्म की रक्षा थी! और तुम कहते हो, "मौजूदा हालात खराब हैं!'*
युधिष्ठिर जुआ खेलते हैं, फिर भी धर्मराज थे! और तुम कहते हो, मौजूदा हालात खराब हैं! आज किसी जुआरी को धर्मराज कहने की हिम्मत कर सकोगे ? और जुआरी भी कुछ छोटे-मोटे नहीं, सब जुए पर लगा दिया। पत्नी तक को दांव पर लगा दिया! एक तो यह बात ही अशोभन है, क्योंकि पत्नी कोई संपत्ति नहीं है। मगर उन दिनों यही धारणा थी, स्त्री-संपत्ति!
उसी धारणा के अनुसार आज भी जब बाप अपनी बेटी का विवाह करता है, तो उसको कहते हैं कन्यादान! क्या गजब कर रहे हो! गाय-भैंस दान करो तो भी समझ में आता है। कन्यादान कर रहे हो! यह दान है? स्त्री कोई वस्तु है? ये असभ्य शब्द, ये असंस्कृत हमारे प्रयोग शब्दों के बंद होने चाहिए। अमानवीय हैं, अशिष्ट हैं, असंस्कृत हैं।
मगर युधिष्ठिर धर्मराज थे। और दांव पर लगा दिया अपनी पत्नी को भी! हद्द का दीवानापन रहा होगा। पहुंचे हुए जुआरी रहे होंगे। इतना भी होश न रहा। और फिर भी धर्मराज धर्मराज ही बने रहे; इससे कुछ अंतर न आया। इससे उनकी प्रतिष्ठा में कोई भेद न पड़ा। इससे उनका आदर जारी रहा।
भीष्म पितामह को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर ब्रह्मज्ञानी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! गुरु द्रोण को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर गुरु द्रोण भी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! अगर कौरव अधार्मिक थे, दुष्ट थे, तो कम से कम भीष्म में इतनी हिम्मत तो होनी चाहिए थी! और बाल-ब्रह्मचारी थे और इतनी भी हिम्मत नहीं? तो खाक ब्रह्मचर्य था यह! किस लोलुपता के कारण गलत लोगों का साथ दे रहे थे? और द्रोण तो गुरु थे अर्जुन के भी, और अर्जुन को बहुत चाहा भी था। लेकिन धन तो कौरवों के पास था; पद कौरवों के पास था; प्रतिष्ठा कौरवों के पास थी। संभावना भी यही थी कि वही जीतेंगे। राज्य उनका था। पांडव तो भिखारी हो गए थे। इंच भर जमीन भी कौरव देने को राजी नहीं थे। और कसूर कुछ कौरवों का हो, ऐसा समझ में आता नहीं। जब तुम्हीं दांव पर लगा कर सब हार गए, तो मांगते किस मुंह से थे? मांगने की बात ही गलत थी। जब हार गए तो हार गए। खुद ही हार गए, अब मांगना क्या है ?
लेकिन गुरु द्रोण भी अर्जुन के साथ खड़े न हुए; खड़े हुए उनके साथ जो गलत थे।
*यही गुरु द्रोण एकलव्य का अंगूठा कटवा कर आ गए थे अर्जुन के हित में, क्योंकि तब संभावना थी कि अर्जुन सम्राट बनेगा। तब इन्होंने एकलव्य को इनकार कर दिया था शिक्षा देने से। क्यों? क्योंकि शूद्र था।* और तुम कहते हो, "मौजूदा हालात बिलकुल पसंद नहीं!'
निर्मल घोष, एकलव्य को मौजूदा हालात उस समय के पसंद पड़े होंगे ? उस गरीब का कसूर क्या था ? अगर उसने मांग की थी, प्रार्थना की थी कि मुझे भी स्वीकार कर लो शिष्य की भांति, मुझे भी सीखने का अवसर दे दो ? लेकिन नहीं, शूद्र को कैसे सीखने का अवसर दिया जा सकता है !!!
मगर एकलव्य अनूठा युवक रहा होगा। अनूठा इसलिए कहता हूं कि उसका खून नहीं खौला। खून खौलता तो साधारण युवक, दो कौड़ी का। सभी युवकों का खौलता है, इसमें कुछ खास बात नहीं। उसका खून नहीं खौला। शांत मन से उसने इसको स्वीकार कर लिया। एकांत जंगल में जाकर गुरु द्रोण की प्रतिमा बना ली। और उसी प्रतिमा के सामने शर-संधान करता रहा। उसी के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा। अदभुत युवक था। उस गुरु के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा जिसने उसे शूद्र के कारण इनकार कर दिया था; अपमान न लिया। अहंकार पर चोट तो लगी होगी, लेकिन शांति से, समता से पी गया।
धीरे-धीरे खबर फैलनी शुरू हो गई कि वह बड़ा निष्णात हो गया है। तो गुरु द्रोण को बेचैनी हुई, क्योंकि बेचैनी यह थी कि खबरें आने लगीं कि अर्जुन उसके मुकाबले कुछ भी नहीं। और अर्जुन पर ही सारा दांव था। अगर अर्जुन सम्राट बने, और सारे जगत में सबसे बड़ा धनुर्धर बने, तो उसी के साथ गुरु द्रोण की भी प्रतिष्ठा होगी। उनका शिष्य, उनका शागिर्द ऊंचाई पर पहुंच जाए, तो गुरु भी ऊंचाई पर पहुंच जाएगा। उनका सारा का सारा न्यस्त स्वार्थ अर्जुन में था। और एकलव्य अगर आगे निकल जाए, तो बड़ी बेचैनी की बात थी।
*तो यह बेशर्म आदमी, जिसको कि ब्रह्मज्ञानी कहा जाता है, यह गुरु द्रोण, जिसने इनकार कर दिया था एकलव्य को शिक्षा देने से, यह उससे दक्षिणा लेने पहुंच गया!* शिक्षा देने से इनकार करने वाला गुरु, जिसने दीक्षा ही न दी, वह दक्षिणा लेने पहुंच गया! हालात बड़े अजीब रहे होंगे! शर्म भी कोई चीज होती है! इज्जत भी कोई बात होती है! आदमी की नाक भी होती है! ये गुरु द्रोण तो बिलकुल नाक-कटे आदमी रहे होंगे! किस मुंह से--जिसको दुत्कार दिया था--उससे जाकर दक्षिणा लेने पहुंच गए!
और फिर भी मैं कहता हूं, एकलव्य अदभुत युवक था; दक्षिणा देने को राजी हो गया। उस गुरु को, जिसने दीक्षा ही नहीं दी कभी! यह जरा सोचो तो! उस गुरु को, जिसने दुत्कार दिया था और कहा कि तू शूद्र है! हम शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते!
बड़ा मजा है! *जिस शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते, उस शूद्र की भी दक्षिणा स्वीकार कर सकते हो!* मगर उसमें षडयंत्र था, चालबाजी थी।
उसने चरणों पर गिर कर कहा, आप जो कहें। मैं तो गरीब हूं, मेरे पास कुछ है नहीं देने को। मगर जो आप कहें, जो मेरे पास हो, तो मैं देने को राजी हूं। यूं प्राण भी देने को राजी हूं।
तो क्या मांगा? *मांगा कि अपने दाएं हाथ का अंगूठा काट कर मुझे दे दे!*
जालसाजी की भी कोई सीमा होती है! अमानवीयता की भी कोई सीमा होती है! कपट की, कूटनीति की भी कोई सीमा होती है! और यह ब्रह्मज्ञानी! उस गरीब एकलव्य से अंगूठा मांग लिया। और अदभुत युवक रहा होगा, निर्मल घोष, दे दिया उसने अपना अंगूठा! तत्क्षण काट कर अपना अंगूठा दे दिया! जानते हुए कि दाएं हाथ का अंगूठा कट जाने का अर्थ है कि मेरी धनुर्विद्या समाप्त हो गई। अब मेरा कोई भविष्य नहीं। इस आदमी ने सारा भविष्य ले लिया। शिक्षा दी नहीं, और दक्षिणा में, जो मैंने अपने आप सीखा था, उस सब को विनिष्ट कर दिया।
*---ओशो--*
नोट: वैज्ञानिक समाजवाद चाहिए! आगे बढ़ें, समय में वापस नहीं जा सकते!

Saturday, 17 September 2016

अम्बेडकर: समझौता परस्त

अम्बेडकर ताउम्र समझौतों रियायतों के जरिये हक लेने के पक्षधर रहे। अब अगर अंबेडकरवादी इस बात से सहमत नहीं हैं तो सुन लीजिए फिर।
अंबेडकर ने कौनसा जमीनी संघर्ष किया? कब सड़क पर उतरे? कब अन्याय के खिलाफ हथियार उठाए?
पूरी जिंदगी कांग्रेस को कोसने के बाद अंत में उसी के साथ समझौता करके संविधान सभा में गए। कभी अंग्रेजों से समझौता कभी गांधी से समझौता।
जब भगत सिंह और उनके साथी साइमन कमीशन के खिलाफ सड़कों पर थे तब अम्बेडकर साइमन के साथ भारत भ्रमण पर थे।
जब तेलंगाना के भूमिहीन दलित अपने हक के लिए लड़ रहे थे और भारत की सेना उन पर गोलियां चला रही थी, तब भी तत्कालीन विधि मंत्री अम्बेडकर आराम से मंत्री की कुर्सी पर बैठे थे।
अब अम्बेडकर आपके आराध्य हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि आलोचना या विवेचना से परे हैं। और बेहतर होगा कि मुझे सिखाने से पहले खुद अम्बेडकरवाद को जान लीजिए। यूँ ही भक्ति करने से सैद्धांतिक समझ नहीं बनती।

Wednesday, 11 May 2016

उत्तराखंड प्रकरण; कुछ भी नया नहीं!

उत्तराखंड प्रकरण, एक मामले में, छोटे स्तर पर ऐतिहसिक है! वैसे आजकल फैशन चल पड़ा है, किसी भी घटना को ऐतिहसिक घोषित करने का, जैसे आई पी एल में रन बनाने का, मोदी का विदेश जाने का, आदि!
उत्तराखंड में केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति शाशन लगाया! दलील है विधान सभा के सदस्यों की खरीद फरक्त! यह कहीं से भी नया नहीं है, भारतीय प्रजातंत्र के इतिहास में! राज्यपाल ने केंद्र के ‘आदेश’ पर कार्यवाही की, यह भी कतई ऐतिहसिक नहीं था!
कोंग्रेस से टूटे विधायक अयोग्य घोषित किये गए विधान सभा के स्पीकर द्वारा, आरोप था दल बदल! सबकुछ पुराना ही चल रहा था! राज्यपाल ने पहले मुख्य मंत्री को बहुमत साबित करने को कहा, पर समय से पहले, केंद्र की चाटुकारिता करते हुए राष्ट्रपति शाशन के लिए ‘आवेदन’ दिया, जिसे केन्द्रीय सरकार ने स्वीकार और रातों रात राष्ट्रपति के पास भेजा, जिन्होंने ने पलक झपकाते ही सिफारिश स्वीकार कर लिया!
उत्तराखंड की अपदस्त सरकार वहां के उच्च न्यायलय पहुंची! और यहाँ कुछ अलग हुआ! माननीय न्याधीश ने राष्ट्रपति शाशन ख़ारिज कर दी और पुराने सरकार को बहाल किया और समय दी अपनी बहुमत साबित करने के लिए! यह थोडा भिन्न था, पर जहाँ तक भारत के प्रजातंत्र की बात है; कोई खास बल नहीं मिलाने वाला था, क्यूँ, आगे चर्चा करेंगे! न्यायाधीश का तबादला भी हो गया!
२२ अप्रैल को यह ‘घमासान’ उच्तम न्यायलय में पहुच चूका था और बहस के बाद न्यायलय ने अपने विवेक में उत्तराखंड आदेश पर स्थगन लगा दिया! मुख्यमंत्री अभी दुबारा पद संभाल भी नहीं सके थे की, पुनः बनबास लेना पड़ा! परजातंत्र या इसका मजाक या भुत?
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देश में ‘फ्लोर टेस्ट’ करवाने की बात की! केंद्र यानि भाजापा मान गया! इस बिच 09 मई को उत्तराखंड हाई कोर्ट का निर्देश आया, बागी विधायक टेस्ट में भाग नहीं ले सकते! कोंग्रेस को राहत! उसी समय सुप्रीम कोर्ट पहुँच गयी, 12 बजे बहस हुई और 4 बजे निर्णय, बागी विधायक हिस्सा नहीं ले सकते!
10 मई को फ्लोर टेस्ट हुआ! कोंग्रेस की सरकार बच गयी! 11 मई को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया, राष्ट्रपति शाशन हटेग, कोंग्रेस की सरकार बहाल होगी! पर अभी सी बी आई का खेल बाकि है, क्यूंकि राज्यपाल ने आदेश दे रखा है जाँच का, मुख्य मंत्री के खिलाफ, जो पकडे गए हैं स्टिंग ओपरेशन में, विधायकों के खरीद फरोक्त में!
कहानी मजेदार नहीं है! पहले भी इस तरह की घटनाएँ घट चुकी हैं! शर्म शार होने जैसी कोई बात नहीं होती आज कल! प्रजातंत्र की हत्या की दुहाई वही देते हैं जो यह काम करते हैं! कोंग्रेस भी पहले यह काम कर चुकी है!
पूंजीवाद में ऐसा होता है, कहना काफी नहीं है! लालच, मौका परस्ती, भ्रष्टाचार तो आम बातें हैं, पर जो कानून बनाता है, उसकी यह हालत तो यही दिखाता है की नरक है यहाँ!
इस व्यवस्था में सुधार की बात करना, देश के करोडो शोषित मजदुरों और किसानॉन के साथ घात करना है और ऊपर के उदाहरणों में जो पूंजी के चाटुकार हैं, उनके साथ मिलकर लुट के माल में बटवारा मांगने जैसा है!
पूंजीवादी उत्पादन बेरोजगारी, भ्रष्टाचार पैदा करता है! मूढ़ता और अन्धविश्वाश पैसा करता है, जहाँ गुरुत्वाकर्षण के तरंगो को खोज लिया गया है! गरीबी पैदा करता है, जहाँ खरबों का उत्पाद भंडारों में सड़ता है, क्यूंकि खरीददार नहीं हैं!
रास्ता एकमात्र है; समाजवाद! यानि, उत्पादन के साधनों पर सामाजिक कंट्रोल! जमीन और बाकि हर संसाधनों पर समाज का कंट्रोल! मानव का मानव द्वारा शोषण का खात्मा! वर्ग विहीन समाज की स्थापना! औरतों का उत्पीडन बंद! बाल मजदुरी एक झटके में ख़त्म!
समाजवादी क्रांति!

Saturday, 7 May 2016

भगवान को पैसा चढ़ाया तो मिलेगा दंड

Paresh L. Soni💰
भगवान को पैसा चढ़ाया तो मिलेगा दंड!💣गा दण्ड💡
नासा (NASA) ने भारत के देवी देवताओं और भगवानों पर रिसर्च की और पाया कि आजकल भगवानों की पालिसी में जबरदस्त बदलाव आया है।उन्हें दान दक्षिणा व चढ़ावे से सख्त घृणा हो गई है। उन्होंने महसूस किया कि दान की रकम का भंयकर दुरुपयोग हो रहा है, मंदिरों की रखरखाव में कोई पैसा खर्च नहीं हो रहा है, मंदिर गन्दे और घुटन भरे हैं।
💣 इस कारण से देवी देवता अपने भक्तों को ही दंडित कर रहे हैं। कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं-
🏊🏽 बद्रीनाथ - केदारनाथ में देवताओं ने हजारो भक्तों को बाढ़ के पानी में डुबो डुबो कर मारा। इसमें वे लोग बच गए जो मंदिर नहीं जा पाए थे।
🚑 एक मामले में माता पिता अपने एक मात्र लड़के के लिए दुआ मानने वेष्णों देवी गये और वहाँ सोने का हार चढ़ाया। कुछ दिनों में ही उनके लड़के की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई।
 एक परिवार शिरडी में 50,000/- रुपये चढ़ा कर घर लौटा तो उसके घर में पदावनति (reversion) का आर्डर पड़ा हुआ था।
👀 एक परिवार तिरुपति से सिर मुड़वा कर घर लौटा तो देखा कि उसके घर से करीब 6 लाख रुपये चोरी हो गए थे।
👥👥 रिसर्च में ऐसे लाखों उदाहरण पाये गये जहाँ देवताओं ने भक्तों को दान - चढ़ावा देने पर दण्ड दिया।
🔔 इसलिए सावधान हो जाएं यदि मंदिर जाये भी तो एक भी पैसा, सामान ना चढ़ायें नहीं तो दण्ड भुगतने के लिए तैयार रहें।
👪 दूसरी ओर देवी देवता मंदिर छोड़कर सामान्य आदमी के भेष में रहने लगे हैं जिसके उदाहरण निम्नलिखित हैं-
📘📒📓 एक अध्यापक ने अपनी नौकरानी की लड़कियों को पढ़ने के लिए मुफ्त किताबें दी और ट्यूशन भी दी तो उसके लड़के को मल्टीनेशनल कंपनी में बहुत अच्छी नौकरी मिल गई।
🙇🏻 एक व्यापारी ने ठंड से कांपते भिखारी को कम्बल दिया और घर बुला कर खाना खिलाया जिससे उसको व्यापार में तीन गुना लाभ मिला।
🌾🍀 एक धनी किसान ने अपने खेतों में काम करने वाले मजदूरों को सामान्य से दुगुनी मजदूरी दी तो उस साल उसका बहुत फायदा हुआ।
👪 इस प्रकार से देवी देवता आजकल गरीबों के रूप में प्रकट हो रहे हैं इसलिए गरीबों को दान दक्षिणा देने से ही फल मिल रहे हैं।
 मंदिर में पैसा चढ़ाना खतरनाक साबित हो रहा है। भगवान को पैसा चढ़ाने या पुजारी को देकर तत्काल वीआईपी दर्शन से भगवान आपकी सम्पत्ति नष्ट कर सकते हैं.
मंदिर में अपने धन बैभव के चढ़ावे का दिखावा न करें, 
वास्तविक जरूरत मंद को सहयोग देकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करें.
जनहित में जारी....

जय भीम लाल सलाम!

रोहित वेमुला के आत्म हत्या के बाद, समाज में एक 'नयी' विचारधारा आई है! वामपंथियों और दलितों का सहयोग और एकता! जे एन यु प्रकरण में यह 'प्रयोग' दिखा! भाजपा की बेचैनी समझ में आती है!
वामपंथी शुरू से ही दलितों, अल्प संख्यकों के साथ हैं! पर हर बार देखा गया है, समर्थन में क्रन्तिकारी विचारधारा का ह्रास!
वाम यानि मजदुर वर्ग की पार्टी! पूंजीवाद को हटाकर समाजवाद लाने वाली पार्टी! निजी पूंजी पर आधारित उत्पादन का ध्वंस! रास्ता मजदुर वर्ग का अधिनायकत्व! वर्ग समाप्ति कर वर्ग विहीन समाज की स्थापना, किसी भी वर्ग का दुसरे वर्ग पर अधिनायकत्व की समाप्ति! मानव द्वारा मानव का शोषण ख़त्म!
स्वतंत्रता के बाद, खासकर स्टॅलिन के मृत्यु के बाद, भारत कम्युनिस्ट पार्टी ने संसदीय प्रजातंत्र को मजबूत करने का काम किया, चुनाव जितना मकसद बन गया! जो रास्ता था, वह लक्ष्य बन गया! धार्मिक, जाति शोषण का विरोध करते करते, उसका उपयोग चुनाव जितने में करने लगे! कोंग्रेस या कई भारी मौकापरस्त छेत्रिय दल भी प्यारे हो गए! अभी बंगाल का चुनाव उदहारण है!
जय भीम लाल सलाम आन्दोलन, आंबेडकर के उन मान्यताओं को लेकर चलता है, जो नारे के रूप में वाम के लिए भी प्रिय है! नेस्तनाबूद करने की बात करते हैं दलित नेता; जाति, धर्म और पूंजीवाद का! मायावती ने ज्यादा वक्त नहीं लिया वाम के 'इस चाल' को और व्यक्तव्य दिया, दलित आन्दोलन साम्यवाद के लिए नहीं हैं!
माना, वाम पंथियों के लक्ष्य मायावती या और कोई दलित नेता नहीं हैं, पर क्या दलित साम्यवादी क्रांति के लिए तैयार हैं?
आगे बढ़ने से पहले यह बताना आवश्यक होगा कि, दलितों का पूरी तरह से  सर्वहाराकरण हो चूका है! उनमे बहुत कम ही पूंजीपति या बहुत धनि हैं, पर उनके नेता बुर्जुआ वर्ग के चाकरी में व्यस्त हैं और एक बहुत ही सुविधा भरी जीवन जी रहे हैं! हाँ, दलित मजदूरों का सामाजिक और जातिय शोषण और प्रतारणा जारी है और पूंजीवाद के संकट में बढ़ता ही जा रहा है!
मजदुर वर्ग के नेत्रित्व में क्रांति! क्यूंकि वह समाज का सबसे अग्रणी वर्ग है और छमता है क्रांति करने का! वह समाज में भारी बहुमत में है, किसान स्वाभाविक रूप से उसके साथ में हैं! "मजदुर वर्ग के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, बल्कि जंजीर है!"
जय भीम लाल सलाम! यदि वाम दलितों के पास जाता है, क्यूंकि वह मजदुर हैं तो फिर बात अलग है, क्रांतिकारी कदम हो सकता है! पर दलितों के 'विचारधारा', जो आर्थिक मांग के साथ सामाजिक बराबरी की बात करता है, सत्ता में हिस्सा लेने की बात करता है और राजनितिक क्रांति को नजर अंदाज करता है, तो इतिहास गवाह है, वाम का ही छरण होगा!
अभी फासीवाद बढ़ रहा है! भारत में आर एस एस के नेत्रित्व में और दुनिया में बाकि जगहों में! फासीवाद का नंगा रूप युक्रेन, अमेरिका में दिख रहा है! आतंकवाद भी चरम है, जो पूंजीवादी साम्राज्यवाद का ही देन है!
ऐसे समय एक बृहद राष्ट्रिय संधि आवश्यक होगा! हर प्रगतिशील संगठन इसका हिस्सा हो सकता है! यह आन्दोलन एक महत्वपूर्ण सहयोग कर सकता है! आर एस एस का रवैया दलितों के प्रति जग जाहिर है!
फासीवाद, यानि पूंजीवाद का ही एक रूप, 2008 के बाद पूंजीपतियों के लिए आवश्यक हो गया! अमेरिका में बैंक घेरो, यूरोप के मजदूरों का भारी विरोध, अविकसित देशों और चीन में भी असर ने पूंजी के चाकरों और 'विद्वानों' को समझ में आया की अभी 'प्रजातान्त्रिक' तरीके सफल नहीं होंगे मजदुर वर्ग के विरोध को दबाने में! इसके पहले क्रांति आगे बढे, इसे तोड़ना होगा और धर्म, जाति, देश, व्यक्ति पूजा, आदि का भरपूर इस्तेमाल करना होगा! घटते मुनाफा और मुनाफा दर को बढ़ाना होगा!
आवश्यक है वाम नेत्रित्व को, की हर प्रगतिशील और क्रांतिकारी समूह को संगठित करें, मजदुर वर्ग के नेत्रित्व में  पूंजीवाद का विरोध करे और क्रांति की तैयारी  रखें, मौका कभी भी मिल सकता है! दलित पीड़ित हैं, पर सर्वहारा क्रांति से अलग लडाई केवल बुर्जुआ 'सुधार' का ही हिस्सा बन जायेगा और शोषण और गहन होगा!

Friday, 8 April 2016

 
💰भगवान को पैसा चढ़ाया तो मिलेगा दण्ड
💡
नासा (NASA) ने भारत के देवी देवताओं और भगवानों पर रिसर्च की और पाया कि आजकल भगवानों की पालिसी में जबरदस्त बदलाव आया है।उन्हें दान दक्षिणा व चढ़ावे से सख्त घृणा हो गई है। उन्होंने महसूस किया कि दान की रकम का भंयकर दुरुपयोग हो रहा है, मंदिरों की रखरखाव में कोई पैसा खर्च नहीं हो रहा है, मंदिर गन्दे और घुटन भरे हैं।
💣 इस कारण से देवी देवता अपने भक्तों को ही दंडित कर रहे हैं। कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं-
🏊🏽 बद्रीनाथ - केदारनाथ में देवताओं ने हजारो भक्तों को बाढ़ के पानी में डुबो डुबो कर मारा। इसमें वे लोग बच गए जो मंदिर नहीं जा पाए थे।
🚑 एक मामले में माता पिता अपने एक मात्र लड़के के लिए दुआ मानने वेष्णों देवी गये और वहाँ सोने का हार चढ़ाया। कुछ दिनों में ही उनके लड़के की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई।
 एक परिवार शिरडी में 50,000/- रुपये चढ़ा कर घर लौटा तो उसके घर में पदावनति (reversion) का आर्डर पड़ा हुआ था।
👀 एक परिवार तिरुपति से सिर मुड़वा कर घर लौटा तो देखा कि उसके घर से करीब 6 लाख रुपये चोरी हो गए थे।
👥👥 रिसर्च में ऐसे लाखों उदाहरण पाये गये जहाँ देवताओं ने भक्तों को दान - चढ़ावा देने पर दण्ड दिया।
🔔 इसलिए सावधान हो जाएं यदि मंदिर जाये भी तो एक भी पैसा, सामान ना चढ़ायें नहीं तो दण्ड भुगतने के लिए तैयार रहें।
👪 दूसरी ओर देवी देवता मंदिर छोड़कर सामान्य आदमी के भेष में रहने लगे हैं जिसके उदाहरण निम्नलिखित हैं-
📘📒📓 एक अध्यापक ने अपनी नौकरानी की लड़कियों को पढ़ने के लिए मुफ्त किताबें दी और ट्यूशन भी दी तो उसके लड़के को मल्टीनेशनल कंपनी में बहुत अच्छी नौकरी मिल गई।
🙇🏻 एक व्यापारी ने ठंड से कांपते भिखारी को कम्बल दिया और घर बुला कर खाना खिलाया जिससे उसको व्यापार में तीन गुना लाभ मिला।
🌾🍀 एक धनी किसान ने अपने खेतों में काम करने वाले मजदूरों को सामान्य से दुगुनी मजदूरी दी तो उस साल उसका बहुत फायदा हुआ।
👪 इस प्रकार से देवी देवता आजकल गरीबों के रूप में प्रकट हो रहे हैं इसलिए गरीबों को दान दक्षिणा देने से ही फल मिल रहे हैं।
 मंदिर में पैसा चढ़ाना खतरनाक साबित हो रहा है। भगवान को पैसा चढ़ाने या पुजारी को देकर तत्काल वीआईपी दर्शन से भगवान आपकी सम्पत्ति नष्ट कर सकते हैं.
मंदिर में अपने धन बैभव के चढ़ावे का दिखावा न करें, 
वास्तविक जरूरत मंद को सहयोग देकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करें.
जनहित में जारी....

Friday, 25 March 2016

बम काण्ड पर सेशन कोर्ट में ‎भगतसिंह‬

“क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है — अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।
समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मुहताज हैं। दुनिया भर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढंकने-भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार त...था बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति जरा-जरा-सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।
यह भयानक असमानता और जबर्दस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिये जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियां मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।”
— बम काण्ड पर सेशन कोर्ट में ‪#‎भगतसिंह‬ का बयान

Thursday, 24 March 2016

भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने वाले आरएसएस से जुड़े थे

Krishna Kanahiya
भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने वाले लोग आरएसएस से जुड़े थे ..
जनता को नहीं पता है कि भगत सिंह के खिलाफ विरुद्ध गवाही देने वाले दो व्यक्ति कौन थे ।
.
जब दिल्ली में भगत सिंह पर अंग्रेजों की अदालत में असेंबली में बम फेंकने का मुकद्दमा चला तो...
भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ शोभा सिंह ने गवाही दी और दूसरा गवाह था शादी लाल !
दोनों नाथूराम गोडसे की तरह आरएसएस से जुड़े थे और दोनों को वतन से की गई इस गद्दारी का 1977 की जनता पार्टी सरकार बनाने पर इनाम भी मिला।
दोनों को न सिर्फ सर की उपाधि दी गई बल्कि और भी कई दूसरे फायदे मिले।
शोभा सिंह को दिल्ली में बेशुमार दौलत और करोड़ों के सरकारी निर्माण कार्यों के ठेके मिले आज कनौट प्लेस में सर शोभा सिंह स्कूल में कतार लगती है बच्चो को प्रवेश नहीं मिलता है जबकि शादी लाल को बागपत के नजदीक अपार संपत्ति मिली।
आज भी श्यामली में शादी लाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब कारखाना है।
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सर शादीलाल और सर शोभा सिंह, भारतीय जनता कि नजरों मे सदा घृणा के पात्र थे और अब तक हैं लेकिन शादी लाल को गांव वालों का ऐसा तिरस्कार झेलना पड़ा कि उसके मरने पर किसी भी दुकानदार ने अपनी दुकान से कफन का कपड़ा तक नहीं दिया।
शादी लाल के लड़के उसका कफ़न दिल्ली से खरीद कर लाए तब जाकर उसका अंतिम संस्कार हो पाया था।
शोभा सिंह खुशनसीब रहा। उसे और उसके पिता सुजान सिंह (जिसके नाम पर पंजाब में कोट सुजान सिंह गांव और दिल्ली में सुजान सिंह पार्क है जिसका उदघाट्न बीजेपी के ही मुख्यमंत्री साहब सिंह वर्मा ने किया था इसके अलावा दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में हजारों एकड़ जमीन मिली और खूब पैसा भी।
शोभा सिंह के बेटे खुशवंत सिंह ने शौकिया तौर पर आरएसएस के मुखपत्र पांजन्य में पत्रकारिता शुरु कर दी और बड़ी-बड़ी हस्तियों से संबंध बनाना शुरु कर दिया।
सर शोभा सिंह के नाम से एक चैरिटबल ट्रस्ट भी बन गया जो अस्पतालों और दूसरी जगहों पर धर्मशालाएं आदि बनवाता तथा मैनेज करता है।
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आज दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास बाराखंबा रोड पर जिस स्कूल को मॉडर्न स्कूल कहते हैं वह शोभा सिंह की जमीन पर ही है और उसे सर शोभा सिंह स्कूल के नाम से जाना जाता था।
खुशवंत सिंह ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर अपने पिता को एक देशभक्त
दूरद्रष्टा और निर्माता साबित करने की भरसक कोशिश की।
खुशवंत सिंह ने खुद को इतिहासकार भी साबित करने की भी कोशिश की और कई घटनाओं की अपने ढंग से व्याख्या भी की।
खुशवंत सिंह ने भी माना है कि उसका पिता शोभा सिंह 8 अप्रैल 1929 को उस वक्त सेंट्रल असेंबली मे मौजूद था जहां भगत सिंह और उनके साथियों ने धुएं वाला बम फेंका था।
बकौल खुशवंत सिह, बाद में शोभा सिंह ने यह गवाही दी, शोभा सिंह 1978 तक जिंदा रहा और दिल्ली की हर छोटे बड़े आयोजन में वह बाकायदा आमंत्रित अतिथि की हैसियत से जाता था।
हालांकि उसे कई जगह अपमानित भी होना पड़ा लेकिन उसने या उसके परिवार ने कभी इसकी फिक्र नहीं की।
खुशवंत सिंह का ट्रस्ट हर साल सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर भी आयोजित करवाता है जिसमे आरएसएस और बीजेपी के बड़े-बड़े नेता और लेखक अपने
विचार रखने आते हैं,
और...
बिना शोभा सिंह की असलियत जाने (य़ा फिर जानबूझ कर अनजान बने) उसकी तस्वीर पर फूल माला चढ़ा आते हैं आज़ादी के दीवानों क विरुद्ध और भी गवाह थे ।
1. शोभा सिंह
2. शादी राम
3. दिवान चन्द फ़ोर्गाट
4. जीवन लाल
कितने बेशर्म है बीजेपी वाले आजादी की लड़ाई में किसी का कोई योगदान नहीं ऊपर से यह गद्दारी फिर भी देशभक्ती का ऐसा स्वांग रचते है के पूछो नहीं.....

Wednesday, 23 March 2016

‘इंक़लाब जिन्दाबाद’, ‘मज़दूर क्रान्ति जिन्दाबाद’: भगतसिंह, बटुकेश्वर दत्त

भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त को सजा सुनाने वाले जज मेडिल्टन ने अपने फैसले में लिखा-
‘‘ये लोग ‘इंक़लाब जिन्दाबाद’ और ‘मज़दूर क्रान्ति जिन्दाबाद’ के नारे लगाते हुए अदालत में दाखिल होते थे, जिससे साफ़ पता चलता है कि वे किस किस्म की विचारधारा में यकीन करते हैं।
इन विचारों के फैलाव को रोकने के लिए मैं उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा दे रहा हूँ।’’

Sunday, 20 March 2016

Private property: Base of all evil!

If there is private property, there is exploitation.
If there is private property, there is exploiters.
If there is private property, there is exploited.
If there is private property, there is parasitic people.
If there is private property, there is class.
If there is private property, there is class rule.
If there is private property, there is class oppression.
If there is private property, there is class contradiction.
If there is private property, there is class struggle.
If there is private property, there is terrorism.
If there is private property, there is killing.
If there is private property, there is violence.
If there is private property, there is rape.
If there is private property, there is crime.
If there is private property, there is punishment.
If there is private property, there is contradiction.
If there is private property, there is conflict.
If there is private property, there is insecurity.
If there is private property, there is quarrel.
If there is private property, there is conspiracy.
If there is private property, there is lie, cheat, fraud etc.
If there is private property, there is ideology.
If there is private property, there is myth.
If there is private property, there is worship.
If there is private property, there is sexism.
If there is private property, there is nationalism.
If there is private property, there is colorism.
If there is private property, there is evil thing.
If there is private property, there is state to rule and oppress.
If there is private property, there is arms forces to kill.
If there is private property,there is division among the human being.
If there is private property, there is discrimination among the human being even by sex.
If there is private property, there is hostility.
If there is private property, there is antagonism.
If there is private property, there is inhumanity.
If there is private property, there is slavery.
If there is capitalist private property, there is wage slavery.
If there is capitalist private property, there is selling and buying.
If there is capitalist private property, there is commodity.
If there is capitalist private property, there is capital.
If there is private property,there is hardship,miseries,sufferings, anxieties, etc.
If there is private property, there is suicide.
But, if there is no private property, there is no such nonsense what mentioned above.
Sure, working class will win the new society free from private property.

Friday, 4 March 2016

31m, or 50%, of US children live in poverty: Report

Capitalist vultures are thriving on flesh, blood of the working class, peasants! Even children are living in dangerous conditions, bereft of basic necessities!
American puppets will clap for the American capitalist imperialism, for what, they only know! Mental derangement or slavery?
62 persons hold what half the world's population, and these clappers have not worth mentioning any, fight to preserve "Private Property"! Oppose Socialism!!
http://timesofindia.indiatimes.com/world/us/31m-or-50-of-US-children-live-in-poverty-Report/articleshow/51248506.cms

Sunday, 21 February 2016

भेड़ियाधसान

Com Aditya Kamal  to Om Prakash Mishra
बुर्जुआ सफल हो गया है यार, जाट आंदोलन का हाल देखो ! पटेलों का देख चुके हो, गुर्जरों का भी देखा ।जो भी जाति मजबूत हो जाती है,विशेषाधिकार प्राप्त करने के लिए उग्र रूप से आन्दोलनों में उतरती है ।आज गरीबी, बेरोजगारी, काम की हालत, सामान्य विधि- व्यवस्था , उत्पीड़न का सबसे बुरा दौर है।
मज़दूरी और कार्य दशा ; मंहगाई और शिक्षा-स्वास्थ्य सबसे ख़राब हालत में है ।आम आदमी का जीवन हर पल संकट में है ।लेकिन देश जल रहा है किस आग में, तो आरक्षण की आग में ।देशप्रेम की आग में ।ब्राह्मणवाद और दलितव...ाद की आग में ।गज़ब विपर्यय है !!
पूरा समाज बंटा है - देशप्रेमी और देशद्रोही में ;वर्णव्यवस्था के उच्च और निम्न श्रेणियों में; सामंती सोच और जनवाद में ।बस एक ही चीज में यह बंटा हुआ नहीं दिख रहा और वो है - मालिक और मज़दूर में ।जो सबसे बड़ी सच्चाई है , उस पर बड़ी सोच-समझ कर चादर डाल दी गई है ।यहां तो भेड़ियाधसान सी हालत है ।यहाँ का बुद्धिजीवी सबसे पिद्दी और बेपेंदी का है ।हमलोगों को बहुत सख्त रहने की ज़रुरत है ।आलोचना कड़ी और खुली होनी चाहिए, सर्किलों में ।यह कचड़ा ऐसे साफ़ नहीं होगा ।ख़तरनाक हालत होती जा रही है यार ।

Saturday, 6 February 2016

Bernie Sanders is for Imperialism!

http://www.counterpunch.org/2016/01/05/does-bernie-sanders-imperialism-matter/

Bernie Sanders is a hidden imperialist agent, like Obama, Clinton or anyone else! If one has no choice, may vote him, but never be under impression that he is for hegemony of working class to replace that of bourgeois rule!
Further, imperialism is not simple "Imperialism can be loosely defined as the multitude of actions that maintain the U.S. global empire." but is also the highest stage of capitalism; monopoly capitalism!
Say no to 'reform' of capitalism, more than 500 years old, decayed, moribund but let it RIP and let new society take birth from the demise of the old! #Socialism

Wednesday, 3 February 2016

85 Years after hanging Bhagat Singh to get justice!

NBT post:-

http://navbharattimes.indiatimes.com/world/pakistan/pakistan-court-to-hear-bhagat-singh-case-from-wednesday/articleshow/50834779.cms

बहुत खुशी की बात है! नमन इस महान क्रांतिकारी, साम्यवादी विचाधारा वाले युवक को!
सहस्त्र नमन!! पाकिस्तानी क्रांतिकारियों को भी ताकत और विचारधारा मिलेगा!!!

Saturday, 16 January 2016

Start Up India: Deprive working class of all rights!

Its not Jumla! “….  from tax waiver for three years, ending inspector raj (No inspection of new concerns for 3 years to safeguard the interests of labour! ) and a mega fund — to help boost the start-up eco-syst..”! Its outright control of capitalist class over our natural resources, market & public fund, created by our working class and peasants over decades and state itself!
Slaves are clapping with heart choked, eyes filled with tears as if something new is happening! When this ruling class was weak economically, post independence, Nehru/Patel as part of Congress vision, helped them grow with all admin, economic assistance, protecting them against foreign MNCs competition, building railways, road, power, giving them loan! When powerful enough, same Congress, under MMS and BJP’s Vajpayee started open loot in name of ‘Reform” and now the world over, after the longest economic recession, since 2008, these henchmen are busy in “reforms” to exploit the working class maximum; legally and illegally!
Nothing is new as far as nature of plunder is concerned, except that it has accelerated, for the bestial lust of profit!
Its not these financiers, capitalists, parasites, their political & religious puppets who will help the people, farmers to grow but exploit them even more for the profit!
Since independence the GDP has grown more than 55% but the poverty has risen; only white money is calculated!
We need to socialise the national property in all forms; land, mines, water, factories, banks, etc, to bring them under the control of the people, end the rule of parasites for a just society, for people’s democracy!! For Scientific Socialism!!