Saturday, 26 August 2017

समाजवाद ही क्यूँ?

समाज को झंझोड़ने में सक्षम है, कल कमजोड था और दुसरे के सहारे जीवित था और बढ़ रहा था, आने वाले कल में विलुप्त हो जायेगा. हर घटना और व्यवस्था का शुरुआत होता है, एक खास नियम के तहत बढ़ता है और अंत होता है. शुरुआत भी किसी और घटना का अंत था, और जिसका अंत हो रहा है, वह एक नयी शुरुआत है किसी और व्यवस्था या दौर का!
प्रकृति के इसी नियम को द्वंद्वात्मक नियम कहते हैं. यहाँ यह भी समझने की बात है की शुरू और अंत के बीच भी इसी नियम का पालन होता है!
चार्वाक, अरस्तु, हेगेल भी इसे समझते थे, और इसे पूर्णयता विज्ञानिक बनाने का श्री जाता है मार्क्स को!
समाज में इस नियम को हर कोई देखता है पर सही निष्कर्ष केवल क्रन्तिकारी और वैज्ञानिक समझ वाले ही निकाल सकते हैं. धार्मिक दिमाग इसका इस्तेमाल जनता को बेवकूफ बनाने के लिए करते हैं. "बड़प्पन छोटों और गरीबों की मदद करने में है! पुन्य कमायें. क्या लाये हो और क्या लेकर जाओगे? हमें ही क्यूँ नहीं दे देते? वगैरह वगैरह!"
हम इस नियम को समझ कर समाज को अगले पड़ाव की ओर अग्रसर करने के लिए करते हैं. जिस पूंजीवाद की स्थापना 500 वर्षों पहले हुई थी सामंतवाद के गर्भ से, अब वह खुद गर्भवती है और उससे समाजवाद पैदा होगा. चूँकि भगवान, अल्लाह या गौड जैसा कोई हस्ती नहीं है, यह मजदूर वर्ग और किसान द्वारा ही होगा. पैदाईशी स्वाभाविक ढंग से ना हो तो सिजेरियन करना होगा, यानि बल प्रयोग करना होगा!
यही तो मार्क्सवाद है, जिसे भगत सिंह और साथियों ने समझा था और HSRA पार्टी के द्वारा अंग्रेजों को हराकर समाजवाद की स्थापना का सपना देखा था!
क्या हम अगले समाज के लिए एकताबद्ध हों या फिर इसी समाज के सड़ांध शव में सुधार की चेष्टा करें?

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