Thursday, 23 March 2017

मानवाधिकार का उल्लंघन

दुर्भाग्य यह नहीं है की 'मानवाधिकार' का उल्लंघन होता आ रहा है, भारत में, विदेशों में भी! बल्कि हम इसके तह में नहीं जा पा रहे हैं! 1977 और 2012 के भी आन्दोलन सत्ता परिवर्तन का ही था, बुर्जुआ वर्ग के एक राजनितिक घटक का दुसरे घटक के द्वारा!
मानवाधिकार केवल राजनितिक ही नहीं, आर्थिक, सामाजिक भी है. मानव मानव की तरह रहने के लायक हो. रोजगार, घर, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदि का हकदार हो! जो नदारद है.
सब के जड़ में क्या है? सत्ता का आधार, राजनीती, अर्थ निति किसके लिए काम कर रहे हैं?. देश के सारे प्राकृतिक संसाधन, उत्पादन के साधन चंद लोगों (1-2%) के हाथ में है. उनके लिए ही राज्य और बाकि सारे तथाकथित प्रजातंत्र के 'खम्भे' काम कर रहे हैं. 
विरोध होने पर धर्म, देश, व्यक्तिवाद का रूप लेता है 'इनका' प्रजातंत्र! फिर शुरू होता तांडव नृत्य. शोषण के खिलाफ विद्रोह को दबाने के लिए शाशन तो हमेशा ही चलता रहता है, कभी कम, कभी ज्यादा. 
जरुरत है, इस आधार को ख़त्म करना. उत्पादन के साधन को निजी स्वामित्व से मुक्त करना. उत्पादक शक्तियों को मुक्त करना, जो अब पूंजीवाद में बंदी है, मुनाफे नामक राक्षस के हाथ में. उत्पादन मुनाफे के लिए नहीं बल्कि समाज के हर सदस्य के उपभोग के लिए.
मानव अधिकार वर्गोपरी नहीं है! सर्वहारा वर्ग के नेत्रित्व में वर्गविहीन समाज संभव है और फिर शोषण का आधार ख़त्म होगा. सही मानवाधिकार तभी संभव है! 
अति संक्षिप्त में पूंजीवाद (अभी यह फासीवाद का रूप ले चूका है) का खात्मा और समाजवाद की स्थापना!

No comments:

Post a Comment