मुझे बताया गया कि इस व्यापार से जो पैसा मिलता है वह दिल्ली में राजनीतिज्ञों के पास पहुंचता है जबकि वह गरीब जो तेंदू पत्ता बटोर रहा है
बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक!
उनका यह अनुभव मनमोहन सिंह के वक्त का है! जमीनी सच्चाई है! पुलिस वर्दी में होने के बावजूद स्थिति का सही आकलन!
जरा मध्य वर्गीय कूपमंडुकों, मूर्खों को भी आप सुन लेना! गरीब आदिवासियों की बातें करते ही उनका हाज़मा ख़राब हो जाता है और आपको वह देशद्रोही और माओवादी बताने लगते हैं! खुद का दिमाग एक छुछुंदर के दिमाग के भी बराबर नहीं है!
देश के करोड़ों शोषित मजदुर, किसान, बेरोजगार युवा, युवती, दलित का एक ही रास्ता है! क्रांति! दूसरा रास्ता आज के सड़े गले आर्थिक, राजनितिक, सामाजिक व्यवस्था को बचाने की कवायद है, जिसका मवाद बहकर समाज को दूषित कर रहा है, जो धर्म, संस्कृति, में भी परिलक्षित हो रहा है!
चलते चलते इसी महानिदेशक का यह व्यक्तव्य भी पढ़ लें:
"देखिए संसद में पारित होने के लिए दो कानून पड़े हुए हैं-एक का सरोकार भूमि अधिग्रहण से है और दूसरे का जंगल के अधिकारों से। अब मजे की बात यह है कि जितने भी खनिज पदार्थ हैं वे इन जंगलों में ही पाए जा रहे हैं और जो पार्टी सत्ता में है उसके लिए तो यह बहुत ही बड़ा खजाना है। अगर आप इन खनिज पदार्थों के निकालने के लिए लाखों करोड़ों डॉलर के करारनामे (एमओयू) पर हस्ताक्षर कर लेते हैं तो इसका एक हिस्सा आप के स्विस बैंक के अकाउंट में पहुंच जाता है। जंगल में रहने वाले उस गरीब आदमी को बड़े आराम से भुला दिया जाता है।"
क्या विद्रोह स्वाभाविक नहीं है इन 'क़ानूनी' लुटेरों के खिलाफ?
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