अच्छा विश्लेषण!
1975-77 के आन्दोलन में जनता थी; मजदूर वर्ग और किसान के साथ! पर यह आन्दोलन क्रन्तिकारी नहीं था. जेपी ने वर्ग संघर्ष को नकारा और वर्ग समन्वय की बात की. कौंग्रेस के विरोध में विपक्षी दलों की सम्मिलत पार्टी, जनता पार्टी, बनायी, जिसमे कौंग्रेस से टूटे समूह, जन संघ, आरएसएस आदि शामिल थे! ह्रस क्या भिन्न होने की संभावना थी?
2012-13 का आन्दोलन तो उससे भी ज्यादा पिछडा था; जहाँ एनजीओ, आरएसएस और उनके दलाल नेत्रित्व संभाले हुए थे! कौंग्रेस के खिलाफ मुहीम तो था पर मुद्दा मुख्यतः जन लोकपाल बिल था, यानि वर्ग संघर्ष या समन्वय की बात तो छोड़ दें, पूंजीवाद के महज एकाध लक्षण, जैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम था. बड़े भारतीय पूंजीपतियों, विदेशी निवेश पूंजी और उनके "थिंक टैंक" दिशा निर्देश पर काम कर रहे थे!
कौंग्रेस का जाना तो तय था पर आन्दोलन किसी क्रन्तिकारी पार्टी के हाथ ना लग जाये, इसकी बेचैनी दिख रही थी! यही नहीं, बल्कि गैर क्रन्तिकारी पार्टी, जो पूंजीवाद में ही सुधार करने की बात करते थे, के हाथ में भी सत्ता देने के खिलाफ थे बड़े पूंजीपति! उनके द्वारा चलाये जा रहे सोशल मिडिया, सड़क पर पैसे द्वारा भीड़, अरबों-खरबों का अनुदान का यही मकसद था!
कुल मिलकर, इस आन्दोलन का नतीजा बहुत ही भयानक हुआ, फासीवाद की उत्पत्ति, मजदूर वर्ग और किसानों पर भयानक जुल्म और उनका शोषण!
अब "युवा वर्ग" का राजनीती में आना. यह हमेशा ही होता है और जनता को भरोसा दिया जाता है की अब सबकुछ ठीक हो जायेगा. 1975 के पहले कौंग्रेस के "युवा तुर्क नेता" मंडली याद है, जिसमे चंद्रशेखर आदि थे?
याद रहे युवा कोई वर्ग नहीं है, बल्कि केवल एक अवस्था है इंसानों के उम्र में, जहाँ ताकत और हौसला, निश्चित रूप से बेहतर है! पर इसी "युवा वर्ग" का एक हिस्सा पूंजीपतियों के साथ है तो कुछ फासीवाद के साथ, तो कुछ धर्म, जाति और देश के नाम पर अपना "धंधा" चला रहे हैं, भले ही राजनितिक हो या गैर राजनितिक! यही युवा, आरएसएस और उसके मालिकों के पैसे पर उनका हजारों आईटी केंद्र चला रहे हैं, सडकों पर गुंडागर्दी कर रहे है और हत्या भी कर रहे हैं!
और यह, आज का युवा नेत्रित्व, कहीं से भी क्रांति की बात नहीं कर रहा है, मजदूर वर्ग की क्रन्तिकारी पार्टी की स्थापना तो कहीं से भी नजर नहीं आ रहा है. मुख्य मुद्दा चुनाव द्वारा सत्ता में आना है फिर उसके बाद जनता के "हितों" को भी देख लेंगे! ह्रस क्या होगा?
पूंजीवाद के कई रूप हैं. किसी और रूप में दिखेगा और एक "सुधार" के आलावा और कुछ नहीं होगा! आज क्रांति का एक ही मतलब है बुर्जुआ वर्ग को सत्ता से अपदस्त करना, मजदूर वर्ग को सत्ता में स्थापित करना, निजी पूंजी को ख़त्म कर सामाजिक धन में बदलना, मानव द्वारा मानव को मजदूरी पर रखने की संभावनाओं को ख़त्म करना, यानि मानव द्वारा मानव के शोषण के किसी भी आधार को ख़त्म करना, एक वर्ग विहीन समाज बनाना!
यह इन युवा नेत्रित्व के समझ से भले ही परे ना हों पर वह ऐसा बिलकुल नहीं कर रहे हैं या बोल भी नहीं रहे हैं. आप तय करें, किस खेमे में जाना है? इन सुधारवादियों के खेमे में या क्रांतिकारियों के खेमे में!
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